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Mahashivratri 2025: शिव जी की पूजा में क्यों वर्जित है शंख? जानें शिवपुराण की कथा

Tue, 18 Feb 2025 12:09 PM IST
ज्योति मेहरा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भगवान शिव की पूजा में शंख का प्रयोग वर्जित है। इस कारण न तो महादेव को शंख जल चढ़ाया जाता है और न ही उनकी पूजा में शंख बजाया जाता है। आइए जानते हैं आखिर इसके पीछे की वजह क्या है...
 
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शिव जी की पूजा में क्यों नहीं बजाते शंख - फोटो : Amar Ujala
Mahashivratri 2025: सनातन धर्म में वैदिक अनुष्ठानों में शंख को बहुत ही शुभ और पूजनीय माना गया है। इसे सुख-समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। शंख को भगवान विष्णु का प्रमुख आयुध माना जाता है और इसकी ध्वनि आध्यात्मिक ऊर्जा से संपन्न होती है।

शास्त्रों के अनुसार शंख की उत्पत्ति शंखचूड़ नामक असुर की हड्डियों से हुई मानी जाती है, जिसके कारण इसे अत्यंत पवित्र और मंगलकारी माना गया है। जहां भगवान विष्णु को शंख अत्यंत प्रिय है और शंख से जल अर्पित करने पर वे प्रसन्न होते हैं, वहीं भगवान शिव की पूजा में शंख का प्रयोग वर्जित है। इस कारण न तो महादेव को शंख जल चढ़ाया जाता है और न ही उनकी पूजा में शंख बजाया जाता है। इस मान्यता के पीछे एक पौराणिक कथा है, जो इस प्रकार है।
 

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शंखचूड़ और उसकी शक्ति की कथा - फोटो : freepik
शंखचूड़ और उसकी शक्ति की कथा
शिवपुराण के अनुसार दैत्यराज दंभ की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा से उसने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान मांगने को कहा। दंभ ने एक महापराक्रमी पुत्र की कामना की, जिसे विष्णु जी ने तथास्तु कहकर स्वीकार कर लिया। कालांतर में दंभ के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम शंखचूड़ रखा गया।
 
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शिव जी की पूजा में क्यों नहीं बजाते शंख - फोटो : adobe stock
जब शंखचूड़ युवा हुआ तो उसने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए पुष्कर में घोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे वरदान मांगने को कहा। शंखचूड़ ने इच्छा व्यक्त की कि वह देवताओं के लिए अजेय बन जाए। ब्रह्माजी ने उसकी यह प्रार्थना स्वीकार करते हुए उसे श्री कृष्ण कवच प्रदान किया, जिसे धारण करने से वह तीनों लोकों में अजेय हो गया। ब्रह्माजी ने उसे धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की अनुमति भी दी। उनके आशीर्वाद से शंखचूड़ और तुलसी का विवाह संपन्न हुआ।
 

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शिव जी की पूजा में क्यों नहीं बजाते शंख - फोटो : freepik
ब्रह्माजी के वरदान के कारण शंखचूड़ में अहंकार आ गया और उसने तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित कर लिया। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता की गुहार लगाई। लेकिन स्वयं विष्णुजी ने उसे वरदान दिया था, इसलिए उन्होंने भगवान शिव से इस संकट को दूर करने की प्रार्थना की। शिवजी ने देवताओं की रक्षा के लिए युद्ध का नेतृत्व किया, लेकिन श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रता धर्म के कारण वे भी शंखचूड़ को पराजित नहीं कर पा रहे थे।
 
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शिव जी की पूजा में क्यों नहीं बजाते शंख - फोटो : freepik
शंख की उत्पत्ति
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए विष्णुजी ने एक ब्राह्मण का रूप धारण कर शंखचूड़ से छलपूर्वक उसका श्रीकृष्ण कवच दान में ले लिया। इसके बाद उन्होंने स्वयं शंखचूड़ का रूप धारण कर उसकी पत्नी तुलसी के पतिव्रत धर्म को भंग कर दिया। श्रीकृष्ण कवच के नष्ट होने और तुलसी के पतिव्रत धर्म टूटने के बाद, भगवान शिव ने अपने विजय नामक त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर दिया। उसके वध के बाद, उसकी हड्डियों से शंख की उत्पत्ति हुई। यही कारण है कि शंख को पवित्र और शुभ माना जाता है, लेकिन भगवान शिव को शंख से जल अर्पित करना वर्जित है।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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