मां महागौरी को क्या भोग लगाएं?
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मां महागौरी की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी। तपस्या के दौरान धूप, ठंड और कठिन साधना के प्रभाव से उनका शरीर काला पड़ गया था। इसके बावजूद देवी अपने संकल्प से पीछे नहीं हटीं। उनकी प्रतिज्ञा थी कि वे भगवान शिव के अतिरिक्त किसी अन्य को पति के रूप में स्वीकार नहीं करेंगी। उनकी इसी अटूट भक्ति का उल्लेख गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई में भी मिलता है:
जन्म कोटि लगि रगर हमारी।
बरऊं संभु न त रहऊं कुंआरी॥
कथा के अनुसार, देवी की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगाजल से उनके शरीर को स्वच्छ किया। गंगाजल के स्पर्श से उनका स्वरूप अत्यंत उज्ज्वल और कांतिमान हो गया। तभी से वे मां महागौरी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। मां महागौरी की यह कथा अटूट संकल्प, धैर्य और भक्ति का संदेश देती है। महाष्टमी के दिन देवी की पूजा, मंत्र जाप, भोग और कन्या पूजन करके भक्त सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।