यज्ञ का परमार्थ का संस्कार
कथा सुनाकर व्यास जी बोले, हे भ्रद! ‘गय’ प्राणों को कहते हैं। प्राण अपने सहयोगी अनुचरों, शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियों के सहयोग से कुछ भी अर्जित कर सकता है। अभिमानी प्राणी ही गया सुर है वह भूल जाता है कि उसे किसी उद्देश्य विशेष के लिए बनाया गया है। बनाने वाले ने अपने लिए दिशा प्राप्त करने की अपेक्षा उसी से वर माँगने की अहंकार भरी बात करता है। यह अहंकारी जीव सामान्य देव वृत्तियों के काबू में नहीं आता। उन्हें सताता है। ब्रह्माजी ने ठीक ही सोचा कि लंबे समय तक यज्ञ का परमार्थ का संस्कार मिले तो शायद यह अभिमान समाप्त हो जाय। इसी दृष्टि से उन्होंने उससे उनका शरीर यज्ञ के लिए मांग लिया।