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Jagannath Rath Yatra 2022: आज से शुरू होगी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा, जानिए सभी जानकारी

Fri, 01 Jul 2022 01:14 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा - फोटो : अमर उजाला
Jagannath Rath Yatra 2022: हर साल की तरह इस बार भी आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा की शुरूआत होने वाली है। पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा इस बार 01 जुलाई, शुक्रवार से शुरू होगी। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ भी निकाला जाता है। तीनों अलग-अलग रथ में सवार होकर यात्रा पर निकलते हैं। रथ यात्रा का समापन आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर होता है। आइए जानते हैं भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की खास बातें और इस धार्मिक महत्व।

रथ और भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी खास बातें...
  • भगवान जगन्नाथ के रथ में एक भी कील का प्रयोग नहीं होता। यह रथ पूरी तरह से लकड़ी से बनाया जाता है, यहां तक की कोई धातु भी रथ में नहीं लगाया जाता है। रथ की लकड़ी का चयन बसंत पंचमी के दिन और रथ बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन से होती है।
  • हर साल भगवान जगन्नाथ समेत बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं नीम की लकड़ी से ही बनाई जाती है। इन रथों में रंगों की भी विशेष ध्यान दिया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रंग सांवला होने के कारण नीम की उसी लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता जो सांवले रंग की हो। वहीं उनके भाई-बहन का रंग गोरा होने के कारण उनकी मूर्तियों को हल्के रंग की नीम की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है।
  • पुरी के भगवान जगन्नाथ के रथ में कुल 16 पहिये होते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ लाल और पीले रंग का होता है और ये रथ अन्य दो रथों से थोड़ा बड़ा भी होता है। भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे पीछे चलता है पहले बलभद्र फिर सुभद्रा का रथ होता है।
  • भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष कहते है,बलराम के रथ का नाम ताल ध्वज और सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन रथ होता है।
  • भगवान को ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा के दिन जिस कुंए के पानी से स्नान कराया जाता है वह पूरे साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है। भगवान जगन्नाथ को हमेशा स्नान में 108 घड़ों में पानी से स्नान कराया जाता है।
  • हर साल आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को नए बनाए हुए रथ में यात्रा में भगवान जगन्नाथ,बलभद्र और सुभद्रा जी नगर का भ्रमण करते हुए जगन्नाथ मंदिर से जनकपुर के गुंडीचा मंदिर पहुंचते हैं। गुंडीचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर है। यहां पहुंचकर विधि-विधान से तीनों मूर्तियों को उतारा जाता है। फिर मौसी के घर स्थापित कर दिया जाता है। 
  • भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर पर सात दिनों तक रहते हैं। फिर आठवें दिन आषाढ़ शुक्ल दशमी पर रथों की वापसी होती है। इसे बहुड़ा यात्रा कहा जाता है।
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jagannath Bahuda Rath Yatra - फोटो : PTI
सोने की झाड़ू से रास्ते की होती है साफ-सफाई
तीनों रथ के तैयार होने के बाद इसकी पूजा के लिए पुरी के गजपति राजा की पालकी आती है। इस पूजा अनुष्ठान को 'छर पहनरा'  नाम से जाना जाता है। इन तीनों रथों की वे विधिवत पूजा करते हैं और ‘सोने की झाड़ू’ से रथ मण्डप और यात्रा वाले रास्ते को साफ किया जाता हैं।
 
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Jagannath Rath Yatra
मौसी के घर जाते हैं विश्राम करने जाते हैं भगवान जगन्नाथ 
आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के साथ रथ को लोग खींचते हैं। जिसे रथ खींचने का सौभाग्य मिल जाता है, वह महाभाग्यशाली माना जाता है। जगन्नाथ मंदिर से रथ यात्रा शुरू होकर 3 कि.मी. दूर गुंडीचा मंदिर पहुँचती है। इस स्थान को भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार यहीं पर विश्वकर्मा ने इन तीनों प्रतिमाओं का निर्माण किया था,अतः यह स्थान जगन्नाथजी की जन्मस्थली भी है। यहां पर तीनों लोग सात दिनों के लिए विश्राम करते हैं। फिर आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ पुनः मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। वापसी की यह यात्रा बहुड़ा यात्रा कहलाती है। जगन्नाथ मंदिर पहुंचने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच देव-विग्रहों को पुनः प्रतिष्ठित किया जाता है।

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Jagannath Rath Yatra - फोटो : iStock
रथ खींचने का मिलता है सौ यज्ञ और मोक्ष का पुण्य फल
भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का अवतार माना गया हैं। स्कंद पुराण के अनुसार जो व्यक्ति रथ यात्रा में शामिल होकर जगत के स्वामी जगन्नाथजी के नाम का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा नगर तक जाता है वह सारे कष्टों से मुक्त हो जाता है, जबकि जो व्यक्ति जगन्नाथ को प्रणाम करते हुए मार्ग के धूल-कीचड़ आदि में लोट-लोट कर जाता है वो सीधे भगवान विष्णु के उत्तम धाम को प्राप्त होता है और जो व्यक्ति गुंडिचा मंडप में रथ पर विराजमान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा देवी के दर्शन दक्षिण दिशा को आते हुए करता है उसे मोक्ष मिलता है।
 
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पुरी में रथ यात्रा की तैयारी - फोटो : PTI
जगन्नाथ मंदिर का ‘महाप्रसाद’
सभी हिंदू मंदिरों में भगवान की पूजा-आराधना और अनुष्ठान करने बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है। लेकिन जगन्नाथ मंदिर ही एक अकेला ऐसा मंदिर है जहां का प्रसाद ‘महाप्रसाद’ कहलाता है। यह महा प्रसाद जगन्नाथ मंदिर में आज भी पुराने तरीके से मंदिर की रसोई में बनता है। ऐसी मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोई है। महाप्रसाद को मिट्टी के 7 बर्तनों में रखकर पकाया जाता है। इन 7 बर्तनों को एक के ऊपर रखकर पकाया जाता है। सबसे खास बात है कि सबसे ऊपर रखा हुआ मिट्टी के बर्तन में प्रसाद सबसे पहले पकता है फिर उसके नीचे की तरफ रखा हुआ बर्तन में प्रसाद एक के बाद एक पकता है। महाप्रसाद को पकाने में सिर्फ लकड़ी और मिट्टी के बर्तन का ही प्रयोग किया जाता है। मंदिर में बनने वाला महाप्रसाद कभी भी लोगों को कम नहीं पड़ता है।
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rath yatra
जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी रोचक कहानियां
  • पुरी के जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा झंडा बहुत ही अनोखा है क्योंकि यहां पर लगा ध्यज हमेशा हवा के विरीत दिशा में लहराता रहता है।
  • पुरी के जगन्नाथ मंदिर में दोपहर के पहर में किसी भी समय मंदिर के शिखर की परछाई नहीं बनती है।
  • मंदिर परिसर में बनी रसोई विश्व की सबसे बड़ी रसोई है जहां पर कुल मिलाकर 752 चूल्हे हैं,जिनमें महाप्रसाद बनाया जाता है।  इस जगह पर जलने वाली अग्नि कभी नहीं बुझती है।
  • जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर कभी ना तो कोई पक्षी बैठता है और न ही कोई विमान मंदिर के ऊपर से नहीं निकलता है।
  • जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा हुआ सुदर्शन चक्र को किसी भी कोने से देखने पर वह हमेशा एक जैसा ही लगा दिखेगा।
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