अस्सी घाट से सुबह का नजारा।
- फोटो : अमर उजाला।
श्रीविष्णु के चरणों से निकली गंगा
पापनाशिनी, मोक्षप्रदायिनी एवं सरितश्रेष्ठा गंगा मैया भारत की ही नहीं वरन विश्व की परम पवित्र महानदी है। ऋग्वेद,अथर्ववेद, रामायण, महाभारत एवं अन्य धर्मग्रंथों में मोक्षप्रदायिनी गंगा मैया का यशोगान मिलता है। इनमें सर्वाधिक प्रचलित मान्यता गंगाजी के श्रीहरि विष्णु के पैर के अंगूठे से निकलने की है। गंगोत्पत्ति से जुडी एक कथा पदमपुराण के अनुसार आदिकाल में ब्रह्माजी ने सृष्टि की 'मूलप्रकृति' से कहा-''हे देवी ! तुम समस्त लोकों का आदिकारण बनो,मैं तुमसे ही संसार की सृष्टि प्रारंभ करूँगा''। ब्रह्मा जी के कहने पर मूलप्रकृति-गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी, उमादेवी, शक्तिबीजा, तपस्विनी और धर्मद्रवा इन सात स्वरूपों में प्रकट हुईं। इनमें से सातवीं 'पराप्रकृति धर्मद्रवा' को सभी धर्मों में प्रतिष्ठित जानकार ब्रह्माजी ने अपने कमण्डल में धारण कर लिया।
राजा बलि के यज्ञ के समय वामन अवतार लिए जब भगवान विष्णु का एक पग आकाश एवं ब्रह्माण्ड को भेदकर ब्रह्मा जी के सामने स्थित हुआ,उस समय अपने कमण्डल के जल से ब्रह्माजी ने श्री विष्णु के चरण का पूजन किया। चरण धोते समय श्री विष्णु का चरणोदक हेमकूट पर्वत पर गिरा। वहां से भगवान शिव के पास पहुंचकर यह जल गंगा के रूप में उनकी जटाओं में समा गया। गंगा बहुत काल तक शिव की जटाओं में भ्रमण करती रहीं। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि स्वर्ग नदी गंगा धरती (मृत्युलोक)आकाश (देवलोक)व रसातल (पाताल लोक) को अपनी तीन मूल धाराओं भागीरथी,मंदाकिनी और भोगवती के रूप में अभिसंचित करती हैं।