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Ganga Saptami 2021: आज गंगा सप्तमी, जानें महत्व, मंत्र और पूजा विधि

Tue, 18 May 2021 07:14 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद, नई दिल्ली
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गंगा में स्नान करते श्रद्धालु - फोटो : अमर उजाला
धर्म शास्त्रों के अनुसार वैशाख शुक्ल सप्तमी तिथि को मां गंगा स्वर्ग लोक से शिवजी की जटाओं में पहुंची थी इसलिए इस दिन को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष गंगा सप्तमी का पर्व मंगलवार, 18 मई 2021 को मनाया जाएगा। इस दिन गंगा मैया के पूजन एवं स्नान से रिद्धि-सिद्धि, यश-सम्मान की प्राप्ति होती है तथा समस्त पापों का क्षय होता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा पूजन से ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम होते हैं। मान्यता है कि जीवनदायिनी गंगा में स्नान, पुण्यसलिला नर्मदा के दर्शन और मोक्षदायिनी शिप्रा के स्मरण मात्र से मोक्ष मिल जाता है। गंगा सप्तमी गंगा मैया के पुनर्जन्म का दिन है इसलिए इसे कई स्थानों पर गंगा जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन किया गया दान कई जन्मों के पुण्य के रूप में मनुष्य को प्राप्त होता है।
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अस्सी घाट से सुबह का नजारा। - फोटो : अमर उजाला।
श्रीविष्णु के चरणों से निकली गंगा 
पापनाशिनी, मोक्षप्रदायिनी एवं सरितश्रेष्ठा गंगा मैया भारत की ही नहीं वरन विश्व की परम पवित्र महानदी है। ऋग्वेद,अथर्ववेद, रामायण, महाभारत एवं अन्य धर्मग्रंथों में मोक्षप्रदायिनी गंगा मैया का यशोगान मिलता है। इनमें सर्वाधिक प्रचलित मान्यता गंगाजी के श्रीहरि विष्णु के पैर के अंगूठे से निकलने की है। गंगोत्पत्ति से जुडी एक कथा पदमपुराण के अनुसार आदिकाल में ब्रह्माजी ने सृष्टि की 'मूलप्रकृति' से कहा-''हे देवी ! तुम समस्त लोकों का आदिकारण बनो,मैं तुमसे ही संसार की सृष्टि प्रारंभ करूँगा''। ब्रह्मा जी के कहने पर मूलप्रकृति-गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी, उमादेवी, शक्तिबीजा, तपस्विनी और धर्मद्रवा इन सात स्वरूपों में प्रकट हुईं। इनमें से सातवीं 'पराप्रकृति धर्मद्रवा' को सभी धर्मों में प्रतिष्ठित जानकार ब्रह्माजी ने अपने कमण्डल में धारण कर लिया।

राजा बलि के यज्ञ के समय वामन अवतार लिए जब भगवान विष्णु का एक पग आकाश एवं ब्रह्माण्ड को भेदकर ब्रह्मा जी के सामने स्थित हुआ,उस समय अपने कमण्डल के जल से ब्रह्माजी ने श्री विष्णु के चरण का पूजन किया। चरण धोते समय श्री विष्णु का चरणोदक हेमकूट पर्वत पर गिरा। वहां से भगवान शिव के पास पहुंचकर यह जल गंगा के रूप में उनकी जटाओं में समा गया। गंगा बहुत काल तक शिव की जटाओं में भ्रमण करती रहीं। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि स्वर्ग नदी गंगा धरती (मृत्युलोक)आकाश (देवलोक)व रसातल (पाताल लोक) को अपनी तीन मूल धाराओं भागीरथी,मंदाकिनी और भोगवती के रूप में अभिसंचित करती हैं।
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गंगाजी की पूजा एवं मंत्र 
इस बार कोरोना महामारी के चलते पवित्र गंगा नदी में स्न्नान करना संभव नहीं है। ऐसे में आप घर में ही सूर्योदय से पूर्व नहाने के पानी में कुछ बूँदें गंगाजल की डालकर स्न्नान करके पुण्यलाभ कमा सकते हैं। स्नान करते समय स्वयं श्री नारायण द्वारा बताए गए मन्त्र-''ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः'' का स्मरण करने से व्यक्ति को परम पुण्य की प्राप्ति होती है। इसके बाद उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में गंगा मैया का ध्यान करते हुए पुष्प अर्पित कर दीपक प्रजवल्लित करके मां की आरती गाएं।
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गंगा सप्तमी की कथा पड़ने या सुनने के बाद किसी भी रूप में गरीबों की सहायता अवश्य करें। दान देने के बाद गाय को भोजन अवश्य कराएं क्योंकि गाय में सभी देवी देवताओं का वास माना जाता है। गंगा सप्तमी के दिन भगवान विष्णु और भगवान शंकर की भी विधिवत पूजा की जाती है, भगवान शंकर का गंगा जल से अभिषेक करने पर शिवजी और गंगा मैया की कृपा प्राप्त होती है मान्यता है कि गंगा मैया के पावन जल के छींटे मात्र शरीर पर पडऩे से जन्म-जन्मांतर के पाप दूर हो जाते हैं। गंगा पूजन व स्नान करने से लौकिक व परलौकिक सुखों की प्राप्ति होती है।

पूजन मंत्र-
मंत्र- 'ॐ नमो भगवति हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा'
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