ganesh chaturthi
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कैसे हुई शुरुआत
प्रदक्षिणा का आरंभ आदिकाल में गणेश जी ने किया। इसके पीछे बड़ी रोचक कथा है। एक बार श्रीगणेश और कार्तिकेय, दोनों भाइयों में बहस शुरू हो गई कि हम दोनों में बुद्धिमान कौन? इसका निर्णय करने के लिए दोनों माता-पिता के पास गए तो शिव-पार्वती ने कहा कि जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुंचेगा, वही बड़ा और श्रेष्ठ बुद्धिमान माना जाएगा। कार्तिकेय मुस्कुराए कि मेरा वाहन मयूर है और गणेश का चूहा, अब तो मेरी जीत सुनिश्चित हो गई।
शर्त के अनुसार, कार्तिकेय जी ने तुरंत अपने वाहन मयूर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा आरंभ कर दी। गणेश जी ने थोड़ी देर शांत बैठकर माता-पिता को अंतर्मन में प्रणाम करते हुए सही मार्ग निकालने की प्रार्थना की। उन्हें उपाय मिल गया। उन्होंने माता-पिता का हाथ पकड़कर ऊंचे आसन पर बिठाया। पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और उन्हीं की प्रदक्षिणा करने लगे। पहली प्रदक्षिणा हुई तो प्रणाम किया, दूसरी प्रदक्षिणा लगाकर भी प्रणाम किया। इस प्रकार कुल सात बार प्रदक्षिणा की।
शिव-पार्वती ने पूछा, “पुत्र, हम दोनों की प्रदक्षिणा क्यों कर रहे हो? तुम्हें तो पृथ्वी की सात प्रदक्षिणा करनी थी।” बुद्धि के स्वामी श्रीगणेश जी ने जवाब दिया,
“सर्वतीर्थमयी माता, सर्वदेवमयो पिता" अर्थात मां में सभी तीर्थों और पिता में सभी देवताओं का वास है। सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता-पिता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है। पांच तत्वों में प्रधान आकाश से ऊंचा पिता का स्थान है। सभी जीवों, नदियों, तीर्थों आदि को धारण करने वाली पृथ्वी मां से भी ऊंचा जन्मदात्री मां का स्थान है। यह शास्त्र वचन है। अतः माता-पिता का पूजन करने से सभी देवी-देवताओं का पूजन हो जाता है। पिता देवस्वरूप और मां देवीस्वरूप हैं। आपकी सात परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएं पूरी कर ली हैं।” गणेश जी के इस प्रकार शास्त्र सम्मत और तर्कपूर्ण वचन सुनकर शिव-पार्वती प्रसन्न हुए और उन्हें विजयी घोषित किया।
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