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Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha: देवउठनी एकादशी के दिन पढ़ें संपूर्ण कथा और जानें कैसे मिलता है व्रत का पुण्यफल

Sat, 01 Nov 2025 06:01 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Dev Uthani Ekadashi Katha: देवउठनी एकादशी भगवान विष्णु की पूजा और भक्ति का पवित्र दिन है, जब वे चार महीने की निद्रा से जागकर सृष्टि का कार्य संभालते हैं। इस दिन व्रत और कथा का पाठ करने से भक्त को दोगुना पुण्य, सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

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Dev uthani ekadashi vrat katha - फोटो : amar ujala
Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha: देवउठनी एकादशी कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ सभी देवता चार महीने की वैशाखी निद्रा से जागृत होते हैं और सृष्टि के कार्यभार को संभालते हैं। इसे भगवान विष्णु की आराधना का विशेष दिन माना जाता है और भक्त इस अवसर पर उनकी पूजा और भोग अर्पित करते हैं।
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इस दिन व्रती भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए उपवास रखते हैं और विधिपूर्वक पूजा करते हैं। साथ ही, देवउठनी एकादशी की कथा का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। कथा के श्रवण और पाठ से न केवल व्रत का फल दोगुना प्राप्त होता है, बल्कि जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। इस दिन धार्मिक विधानों का पालन करना अत्यंत लाभकारी होता है।
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पहली कथा: भक्त और भगवान का भोजन - फोटो : adobe
पहली कथा
एक समय की बात है, एक राजा के राज्य में सभी लोग बहुत धर्मपरायण थे। इस राज्य में एकादशी का दिन बहुत ही पवित्र माना जाता था। राजा ने अपने राज्य के सभी लोगों, नौकर-चाकर और यहाँ तक कि पशुओं तक को आदेश दिया था कि एकादशी के दिन किसी को अन्न न दिया जाए। सभी लोग इस दिन फलाहार ही करते थे।
एक दिन दूसरे राज्य का एक व्यक्ति उस राजा के पास नौकरी मांगने आया। राजा ने कहा, “ठीक है, तुम्हें नौकरी दे देता हूँ, लेकिन एक शर्त है। रोज़ तुम्हें भोजन मिलेगा, पर एकादशी के दिन अन्न नहीं मिलेगा।” उस व्यक्ति ने खुशी-खुशी शर्त मान ली।
एकादशी का दिन आया और व्यक्ति को फलाहार दिया गया। लेकिन वह अपने मन में सोचने लगा कि फलाहार से पेट कैसे भरेगा। वह राजा के सामने जाकर विनती करने लगा कि मुझे अन्न दें, नहीं तो मैं भूखा मर जाऊँगा। राजा ने उसे शर्त याद दिलाई, पर अंत में उसे अन्न दे दिया।
व्यक्ति ने जैसे ही भोजन बनाया, उसने भगवान को बुलाया, “आओ भगवान, भोजन तैयार है।” तभी पीताम्बरधारी भगवान चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए और उसके साथ भोजन करने लगे। भोजन करने के बाद भगवान अंतर्धान हो गए।
पंद्रह दिन बाद जब व्यक्ति ने राजा से दुगुना अन्न मांगा, तो राजा ने पूछा क्यों। उसने बताया कि भगवान भी उसके साथ खाते हैं, इसलिए अन्न पूरा नहीं होता। यह सुनकर राजा आश्चर्यचकित हो गया और व्यक्ति के साथ नदी के किनारे छिपकर देखा। जब व्यक्ति ने भोजन बनाया और भगवान को पुकारा, भगवान तुरंत प्रकट हुए। उन्होंने भोजन किया और उसे अपने धाम ले गए। इस घटना से राजा ने सीखा कि व्रत और पूजा का फल केवल मन की शुद्ध भक्ति से ही मिलता है।
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दूसरी कथा: भगवान विष्णु की निद्रा और पुण्य - फोटो : freepik
दूसरी कथा
भगवान नारायण लगातार जगते रहते थे, जिससे देवी लक्ष्मी और अन्य देवताओं को भी विश्राम नहीं मिलता था। एक दिन देवी लक्ष्मी ने भगवान से कहा, “हे नाथ! यदि आप हमेशा जागते रहते हैं तो हमें भी विश्राम नहीं मिलेगा। कृपया वर्ष में चार महीने की निद्रा लें।”
भगवान विष्णु ने उनकी बात मानते हुए निर्णय लिया कि वर्षा ऋतु के चार महीने वह अल्पनिद्रा लेंगे। इसे ‘प्रलयकालीन महान निद्रा’ कहा गया। इस समय उनके भक्तों को विशेष पुण्य और कल्याणकारी फल प्राप्त होते हैं।
भगवान ने कहा कि जो भक्त इस समय उनकी सेवा करेंगे, पूजा करेंगे और उनके जागरण और निद्रा के अवसर का पालन करेंगे, उनके घर में सुख-समृद्धि बनी रहेगी। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि भगवान की सेवा और उनके नियमों का पालन करने से जीवन में शांति और आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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तीसरी कथा: राजा की परीक्षा और भक्ति - फोटो : adobe stock
तीसरी कथा
एक नगर में एक राजा था, जिसका राज्य बहुत सुख-समृद्ध था। उस नगर में एकादशी के दिन कोई भी अन्न नहीं बेचता और सभी लोग केवल फलाहार करते थे। भगवान ने राजा की भक्ति और धर्म की परीक्षा लेने के लिए सुंदरी का रूप धारण किया और नगर में आकर सड़क पर बैठ गए।

राजा ने सुंदरी से पूछा, “तुम कौन हो और यहाँ क्यों बैठी हो?” सुंदरी ने कहा, “मैं निराश्रिता हूँ, नगर में मेरा कोई परिचय नहीं है। कृपया मेरी मदद करें।” राजा मोहित हो गया और बोला कि वह उसे अपने महल में रानी बनाकर रखेगा।
सुंदरी ने कहा, “मैं आपकी बात मानूंगी, लेकिन आप मुझे राज्य का अधिकार सौंप दें। मैं जो बनाऊँगी, आपको उसका पालन करना होगा।” राजा ने मोहित होकर उसकी शर्त मान ली।

अगले दिन एकादशी आई। सुंदरी ने हुक्म दिया कि अन्न बेचा जाए और मांस-मछली पकवाएं। राजा ने केवल फलाहार किया। सुंदरी ने राजा से कहा कि या तो वह भोजन खाए या वह बड़े राजकुमार का सिर काट देगी। राजा ने धर्म का पालन करते हुए राजकुमार को देने की तैयारी की।

तभी भगवान विष्णु ने अपने असली रूप में प्रकट होकर सब सही कर दिया। भगवान ने राजा की भक्ति और धर्मपरायणता देखकर उसे आशीर्वाद दिया। भगवान के आने पर राजा ने राज्य अपने पुत्र को सौंपा और अपने धाम के लिए चले गए।

इस कथा से यह संदेश मिलता है कि भक्ति, धर्म और व्रत का पालन केवल नियमों के लिए नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और सच्ची श्रद्धा के लिए होना चाहिए।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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