तीसरी कथा: राजा की परीक्षा और भक्ति
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तीसरी कथा
एक नगर में एक राजा था, जिसका राज्य बहुत सुख-समृद्ध था। उस नगर में एकादशी के दिन कोई भी अन्न नहीं बेचता और सभी लोग केवल फलाहार करते थे। भगवान ने राजा की भक्ति और धर्म की परीक्षा लेने के लिए सुंदरी का रूप धारण किया और नगर में आकर सड़क पर बैठ गए।
राजा ने सुंदरी से पूछा, “तुम कौन हो और यहाँ क्यों बैठी हो?” सुंदरी ने कहा, “मैं निराश्रिता हूँ, नगर में मेरा कोई परिचय नहीं है। कृपया मेरी मदद करें।” राजा मोहित हो गया और बोला कि वह उसे अपने महल में रानी बनाकर रखेगा।
सुंदरी ने कहा, “मैं आपकी बात मानूंगी, लेकिन आप मुझे राज्य का अधिकार सौंप दें। मैं जो बनाऊँगी, आपको उसका पालन करना होगा।” राजा ने मोहित होकर उसकी शर्त मान ली।
अगले दिन एकादशी आई। सुंदरी ने हुक्म दिया कि अन्न बेचा जाए और मांस-मछली पकवाएं। राजा ने केवल फलाहार किया। सुंदरी ने राजा से कहा कि या तो वह भोजन खाए या वह बड़े राजकुमार का सिर काट देगी। राजा ने धर्म का पालन करते हुए राजकुमार को देने की तैयारी की।
तभी भगवान विष्णु ने अपने असली रूप में प्रकट होकर सब सही कर दिया। भगवान ने राजा की भक्ति और धर्मपरायणता देखकर उसे आशीर्वाद दिया। भगवान के आने पर राजा ने राज्य अपने पुत्र को सौंपा और अपने धाम के लिए चले गए।
इस कथा से यह संदेश मिलता है कि भक्ति, धर्म और व्रत का पालन केवल नियमों के लिए नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और सच्ची श्रद्धा के लिए होना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।