तब ऊंटों में सामान लेकर व्यापारी पंजाब के रोपड़ व नवांशहर से यहां पहुंचते थे। रोपड़, नालागढ़ और बिलासपुर के ग्रामीण क्षेत्रों से बैलों की मंडी नलवाड़ी मेले में लगती थी। हजारों की संख्या में पशुओं का क्रय-विक्रय होता था। बताया तो यह भी जाता है कि पुराने शहर से हर परिवार की महिलाएं बैलों को आटे के पेड़े खिलाती थी। इसे पुण्य माना जाता था। हालांकि उस समय बिजली की व्यवस्था नहीं होती थी, लेकिन तब भी काफी चकाचौंध रहती थी।