देव समागम मंडी शिवरात्रि के अंतरराष्ट्रीय महोत्सव में सदियों पुरानी परंपरा को आज भी निभाया जा रहा है। 5 से 11 मार्च तक चलने वाले इस महोत्सव के लिए हर बार की तरह इस बार भी छह नरोल देवियों को निमंत्रण भेजा गया है।
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लेकिन ये छह देवियां बगलामुखी, श्री देवी बूढ़ी भैरवा पंडोह, श्री देवी काश्मीरी माता, श्री धूमावती मां पंडोह, देवी बुशाई माता राज माता कहनवाल व रूपेश्वरी राजमाता न जलेब में शिरकत करेंगी और न ही पड्डल मैदान में होने वाले देव समागम का हिस्सा बनेंगी।
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शिवरात्रि मेले के दौरान एक सप्ताह ये सभी देवियां राजमहल में रानियों के निवास स्थान रूपेश्वरी बेहड़े में घुंघट में वास करती हैं। रियासतकाल से चली आ रही देव समागम शिवरात्रि में रानियों से सखी प्रेम को नरोल देवियां आज भी निभा रही हैं।
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श्री देवी बूढ़ी भैरवा माता के प्रधान नरेश कुमार ने कहा कि छह देवियां रानियों की तरह घुंघट डालकर राजमहल में एकांत वास करती हैं। राजमहल में ही रानियों के बेहड़े में वास कर देवियां रानियों से सखियों की तरह बातें करती थीं।
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सखी प्रेम की रीत को नरोल देवियां आज भी निभा रही हैं। श्री देवी बुशाई माता कहनवाल के कारदार सुधीर कुमार ने कहा कि रानियों को मेले में जाने की इजाजत नहीं होती थी। रानियां रूपेश्वरी बेहड़े में ही घुंघट में रहती थीं। देवियों द्वारा यह परंपरा आज भी निभाई जा रही है।
धुआंधार माता के उपप्रधान जीवन लाल ने बताया कि रानियों के लिए राजा ने नरोल देवियों को शिवरात्रि महोत्सव में आमंत्रण दिया। उसके बाद से देवियां शिरकत कर रही हैं। राजाओं की रियासतें नहीं रहीं लेकिन देवियां महोत्सव में छोटी काशी मंडी में आती हैं, लेकिन मेले में शिरकत करने की बजाए रूपेश्वरी बेहड़े में घुंघट में ही विराजमान रहती हैं।