बारिश के बाद हिमालय पर ऐसा नजारा देखने को मिला कि वैज्ञानिक भी हैरान रह गए। वैज्ञानिक इसे बड़ी तबाही का संकेत मान रहे हैं। आइए जानते हैं क्या है वैज्ञानिकों की चिंता की वजह-
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हिमालय पर अध्ययन कर रहे जीबी पंत राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों का कहना है कि बीते दिनों हुई बारिश के बाद हिमालय पर बिछी बर्फ की मोटी परत अचानक रंग बदल रही है। हिमालयी क्षेत्र में पहली बार ऐसा नजारा देखने को मिला है।
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यही नहीं, इन इलाकों में दशकों से रह रहे लोग भी हैरान है। लोगों का कहना है कि उन्होंने पहले कभी ऐसा होते नहीं देखा। हिमालय के बड़ा शिगरी, छोटा शिगरी, ककटी, कांगला, गंगस्टांग, कुगती समेत कई ग्लेशियरों का रंग काला होने लगा है। आगे पढ़िए क्या है ये चीज-
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दरअसल हिमालय के विशाल ग्लेशियरों पर नया खतरा मंडरा रहा है। इससे हिमालयी क्षेत्रों की दुर्लभ जड़ी-बूटियों पर भी असर पड़ेगा। पश्चिमी हिमालय के कई ग्लेशियरों पर धूल की परत के साथ ही हल्के काले रंग की पपड़ी सी जम गई है।
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बीते दिनों हुई बारिश, बर्फबारी से पश्चिमी हिमालय के ग्लेशियरों पर करीब एक सेंटीमीटर मोटी धूल की परत चढ़ गई है, जिसकी वजह से ग्लेशियर हल्के काले रंग में बदल गए हैं।
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स्थानीय बुजुग दोरजे, टशी, अंगरूप, छिमेद का कहना है कि उन्होंने दशकों बाद ग्लेशियरों पर काली धूल जमी देखी। यह कतई अच्छा संकेत नहीं है। जीबी पंत राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों का कहना है कि तेल के कुओं से उठा धुआं रेगिस्तानी इलाके से होते हुए हिमालय के क्षेत्रों तक पहुंच गया है। आगे पढ़ें कहां से आई है ये काली धूल-
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ऐसे में इस बार हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की आशंका है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ जाएगी। अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. जेसी कुनियाल का कहना है कि जिस तरह पश्चिमी हिमालय के ग्लेशियरों पर मिट्टी की परत बिछी है, उससे ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे और बाढ़, भूस्खलन की आशंका बढ़ेगी।
ग्लोबल वार्मिंग का असर रोहतांग दर्रे को पार करते हुए लाहौल के जनजातीय इलाकों तक पहुंच गया है। बारिश और बर्फबारी से मिट्टी के कण ग्लेशियरों से चिपक रहे हैं जो पर्यावरणीय लिहाज से ठीक नहीं है।