हिमाचल को देवभूमि के साथ वीरभूमि भी कहा जाता है। हिमाचल के वीर सपूतों ने जब-जब भी जरूरत पड़ी देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दी।बात चाहे सीमाओं की सुरक्षा की हो या फिर आतंकवादियों को ढेर करने की।
विज्ञापन
2 of 7
देवभूमि के रणबांकुरे अग्रिम पंक्ति में रहे। पुलवामा आतंकी हमले में भी हिमाचल के जवान शहीद तिलक राज ने सर्वोच्च बलिदान देते हुए अपने प्राणों की आहुति दी।
विज्ञापन
3 of 7
जबकि एक जवान दविंद्र कुमार आतंकवादियों से लोहा लेते घायल हुए। प्रदेश के इन रणबांकुरों की वीरता और त्याग से हर हिमाचली अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है। इन जांबाजों के बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा।
4 of 7
हिमाचल में अभी तक 1222 सैनिक युद्ध के दौरान या हमले के दौरान शहीद हुए हैं। प्रदेश के चार सैनिकों को परमवीर चक्र, दो सैनिकों को अशोक चक्र, दस को महावीर चक्र, 21 को कीर्ती चक्र, 55 को वीर चक्र और 92 को शौर्य चक्र मिला है।
विज्ञापन
5 of 7
हिमाचल के इन बेटों ने दुश्मनों को नाकों चने चबाने पर मजबूर किया। देश की सीमाओं के प्रहरी इन वीरों के कारण ही हम सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को धूल चटाई गई थी।
विज्ञापन
6 of 7
कारगिल संघर्ष में विजय हासिल करने में हिमाचल के सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। इसमें प्रदेश के 52 रणबांकुरों ने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहूति दी थी।
हिमाचल प्रदेश सैनिक कल्याण विभाग के निदेशक बिग्रेडियर एसके वर्मा ने कहा कि हिमाचल वीर सपूतों का देश की रक्षा के लिए अहम योगदान रहा है। 1965, 1971 से लेकर कारगिल युद्ध में हिमाचल के रणबांकुरों ने दुश्मनों को ढेर कर अपने प्राणों की आहुति दी।