हिमाचल प्रदेश के पालमपुर की हरियाली में 9 सितंबर 1974 को जन्में कैप्टन विक्रम बत्रा हमेशा कहते थे- ये दिल मांगे मोर। 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के कैप्टन ने कारगिल में अदम्य साहस का परिचय देते हुए देश का गौरव बढ़ाया लेकिन वो युद्ध में शहीद हो गए।
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आज है इस परमवीर का जन्मदिन जिससे कांपते थे दुश्मन
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खास बात ये है कि दुश्मन ने भी बत्रा की शहादत को सलाम किया।
पाकिस्तानी लड़ाकों को मार भगाने वाले बत्रा ने कई चोटियों से दुश्मन को
रफा दफा कर दिया था। पाकिस्तानी सेना ने बत्रा को शेरशाह के नाम से नवाजा
था।
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बत्रा ने साथियों के साथ सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को अपने
कब्जे में लिया। इसके बाद चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष ‘यह दिल
मांगे मोर’ कहा तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया।
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इस
जीत के बाद उन्हें चोटी नं. 4875 पर कब्जा करने की भी जिम्मेदारी दी गई।
कई लड़ाकों को मार गिराने के दौरान फायरिंग में घायल होने के बाद भी बत्रा
ने डेल्टा टुकड़ी के साथ इस चोटी पर हमला कर दिया। इस दौरान एक साथी घायल हो
गया और बत्रा दोस्ती की खातिर उसे जंगी जगह से निकालने लगे।
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उसी दौरान दुश्मन की गोलियों ने बत्रा को छलनी कर दिया। 7 जुलाई 1999 को भारत मां का सच्चा सपूत देश पर शहीद हो गया।
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शहादत का जाम पीने वाले शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा का नारा दिल मांगे मोर आज भी हर किसी की जुबान पर है। कैप्टन विक्रम बत्रा की शहादत पर भारत सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा था।
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उनके जन्मदिन पर हिमाचल के कांगड़ा में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। उनके नाम से बने कई भवनों के उद्घाटन किए गए।
विधानसभा अध्यक्ष ने शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उनको श्रद्धांजलि अर्पित की। बुटेल ने कहा कि मातृभूमि की रक्षा में प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों से पालमपुर की देश भर में अलग पहचान बनी है।