इस धरती पर देवी देवता एक दूसरे से कैसे मिलते हैं, ये नजारा शायद ही आपने देखा होगा। एक दूसरे से मिलने के लिए देवता खास तरह का चमत्कार दिखाते हैं। आइए जानते हैं..
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जानिए, कुल्लू दशहरे में देवताओं के मिलन की कहानी
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देवता जब भी अपने मंदिर या देवालय से बाहर निकलते हैं तो उनके लिए पालकीनुमा आसन के रूप में एक खास सवारी तैयार की जाती है। देवलू (जमाणी) देवता को इस पालकी में अपने कंधों पर उठा लेते हैं। देवता जिस दिशा में जाना चाहते हैं पालकी खुद ब खुद उधर मुड़ने लगती है।
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अंतर्राष्ट्रीय
कुल्लू दशहरे में हर साल ऐसे देव मिलन के नजारे देखने को मिलते हैं।
जानकारों के अनुसार देवता खुद अपना मार्ग तय करता है। भीड़ में कब कहां
जाना है, इसका आदेश देवता ही देते हैं। देवता जिस खास पालकी पर बैठता है वह
उसके आदेशानुसार इधर उधर मुड़ती है।
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देवता तय करते हैं कि कब किस
देवता से मिलना है। जब देव मिलन होना होता है उस समय देवता की सवारी खुद ब
खुद दूसरे देवता की ओर झुक जाती है। देवता को उठा रहे देवलुओं का इस पर कोई
नियंत्रण नहीं होता।
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ऐसे माना जाता है कि ये मिलन ऐसे ही होता है
जैसे एक इंसान दूसरे इंसान से मिलता है। देवता फिर दूसरे साल एक दूसरे से
मिलने का वादा कर अपने अपने देवालयों में लौट जाते हैं।
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देवलू बताते
हैं कि कई बार जब देवता प्रचंड हो जाते हैं तो पालकी अचानक ही हिलने लग
जाती है। ऐसे में देवलु देवता के संकेत समझ जाते हैं।
लोगों का
भरोसा है कि देवता सच्चे और ईमानदार लोगों को सही राह दिखाते हैं। लेकिन जो
लोग देवता के बारे में बुरा सोचते हैं, उन्हें इसके परिणाम भी तुरंत ही
भुगतने पड़ते हैं।