दुनिया भर में विख्यात हिमाचल का ज्वालाजी मंदिर एक ऐसा मंदिर है जहां हर वक्त मां ज्वाला आग की लपटों के रूप में दर्शन देती है। इसकी कहानी भी बड़ी रोचक है।
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यहां हर वक्त आग के रूप में दर्शन देती है 'मां ज्वाला'
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मां सती की कहानी से जुड़ा ये मंदिर ऐतिहासिक है। यहां आने से हर मनोकामना पूरी होती है। ज्वालाजी का ये मंदिर शिव की कहानी से भी जुड़ा है।
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मान्यता है कि सती के पिता यानि प्रजापति दक्ष ने एक बार अपने महल में विशाल यज्ञ करवाया जिसमें शिव को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया था। अपने पति शिव भगवान का अपमान देख मां सती ने हवनकुंड में आत्मदाह कर दिया था।
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जब भगवान शिव को इसका पता चला तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। वे मां सती के जले हुए शरीर को लेकर तीनों लोकों में पहुंच गए। भोलेनाथ के गुस्से को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन से सती के शरीर को कई भागों में विखंडित कर दिया।
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इससे शरीर के हिस्से देश के अलग अलग जगहों पर गिरे। जहां भी ये भाग गिरे वहां पवित्र मंदिर बनवाए गए। मान्यता है कि मां सती की जीभ कांगड़ा के इस क्षेत्र में गिरी जहां आज भव्य ज्वालाजी मंदिर बनाया गया है।
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इसके बाद यहां बड़ी चट्टानों के बीच से मां सती ज्वाला के रूप में दिखती है।
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ऐसा भी माना जाता है कि जब अकबर को इसका पता चला तो वह भी यहां आ पहुंचा। उसे इस पर बिल्कुल भरोसा नहीं था।
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उसने इस ज्वाला को बुझाने की खूब कोशिश की और लोहे के तवों से इसे दबा दिया। लेकिन आग की लपटें कहां दफन होने वाली थी। आखिरकार अकबर ने हार मानी और सोने का छत्र मां को समर्पित किया।
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कहा जाता है कि मां ज्वाला की बड़ी बहन बाकू में थी। यहां आग की लपटें काफी बड़ी थी।