चाहे सामाजिक सरोकार हों, खेत-खलिहान हों, प्रशासनिक सेवा हो या फिर खेल का मैदान... प्रदेश की महिलाओं ने परचम लहराया है। इतना ही नहीं, बस-ट्रक और टैक्सी के अलावा हवाई जहाज भी सूबे की बेटियां उड़ा रही हैं...
पहाड़ों की विपरीत परिस्थितियों से जूझतीं हिमाचल की महिलाएं देश-दुनिया में आज मिसाल पेश कर रहीं हैं। हिमाचल की बेटियों ने कड़े संघर्ष, लग्न और मेहनत से रूढि़यों-बंदिशों को तोड़कर हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। चाहे सामाजिक सरोकार हों, खेत-खलिहान हों, प्रशासनिक सेवा हो या फिर खेल का मैदान... प्रदेश की महिलाओं ने परचम लहराया है। इतना ही नहीं, बस-ट्रक और टैक्सी के अलावा हवाई जहाज भी सूबे की बेटियां उड़ा रही हैं...
नौकरी के पीछे न भाग पढ़ी-लिखी महिलाएं उगा रहीं सेब
नौकरी के पीछे न भाग कर हिमाचल की पढ़ी-लिखी महिलाएं सेब बागवानी को बतौर व्यवसाय अपना रही हैं। शिमला और कुल्लू जिले की सीमा पर स्थित आनी की बागवान शिल्पा ठाकुर महिलाओं के लिए मिसाल बनी हैं। सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक शिल्पा बगीचे में काम करती हैं। शिल्पा ने पति पंकज ठाकुर के साथ मिलकर 10,500 पौधों का एचडीपी यानी उच्च घनत्व पौधरोपण बगीचा तैयार किया है। सोशल मीडिया पर भी शिल्पा की बड़ी फैन फॉलोइंग है। फेसबुक पेज पर इनके 87,000 फाॅलोअर्स हैं। वीडियो अपलोड कर शिल्पा एचडीपी ऑचर्ड को लेकर टिप्स भी देती हैं।
वीडियो को तीन दिन में पांच लाख व्यूज
शादी से पहले शिल्पा आम लड़कियों की तरह शहर में बसने और नौकरी करने के सपने देखती थीं, लेकिन 2019 में शादी के बाद पति पंकज ठाकुर के बागवानी के प्रति जुनून को देखकर शिल्पा ने भी खुद को इसी क्षेत्र के लिए समर्पित कर दिया। एचडीपी ऑचर्ड के लिए इन्होंने पौधे इटली से आयात किए। टपक सिंचाई सुविधा से लैस बगीचे में लिक्विड खाद डालने, चिलिंग-फॉगिंग, नोचिंग और प्रूनिंग हर काम में शिल्पा दक्ष हैं। वेदर स्टेशन से तापमान जांचना हो या नमी की मात्रा का पता लगाना हो, शिल्पा इस काम में भी पारंगत है। बगीचे में सोलर फेंसिंग की रिपेयर भी शिल्पा खुद ही करती हैं। बगीचे में सेमी ऑटोमेटिक हेल नेटिंग का संचालन भी जरूरत पड़ने पर शिल्पा खुद करती हैं। शिल्पा ने अगस्त 2024 में अपने बगीचे में सेब तोड़ते समय वीडियो शूट किया था। इस वीडियो को सिर्फ तीन दिन में 5 लाख व्यूज मिले।
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हिमाचल की साक्षी
- फोटो : अमर उजाला
देश की सबसे कम उम्र की कमर्शियल पायलट हैं हिमाचल की साक्षी
हिमाचल प्रदेश के परवाणू की रहने वाली 18 साल की साक्षी कोचर ने देश की सबसे युवा कमर्शियल पायलट बनकर रिकॉर्ड कायम किया है। मध्यवर्गीय परिवार से संबंध रखने वालीं साक्षी ने अपनी कामयाबी से यह साबित कर दिखाया है कि सफल होने के लिए जरूरी नहीं कि किसी की उम्र बड़ी हो और उसके पास अधिक तजुर्बा हो, बल्कि कुछ कर गुजरने का जुनून हो, तो कम उम्र में भी सपनों को साकार किया जा सकता है। साक्षी इसकी सशक्त मिसाल हैं। स्कूल-कॉलेज जाने की उम्र में उन्होंने दुनिया के सबसे कठिन प्रशिक्षण को पूरा कर कमर्शियल पायलट लाइसेंस (सीपीएल) हासिल किया है।
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सीमा ठाकुर।
- फोटो : अमर उजाला
हिमाचल की पहली महिला बस चालक हैं सीमा ठाकुर
सीमा ठाकुर ने एचआरटीसी में पहली महिला बस ड्राइवर चालक बनने का गौरव हासिल किया है। सीमा के पिता भी एचआरटीसी में ही चालक थे। पिता के साथ बस में सफर के दौरान ही सीमा को बस चलाने का शौक पैदा हुआ। 5 मई 2016 को एचआरटीसी में बतौर चालक ज्वाइनिंग देने के बाद भी उन्हें बस न देकर टैक्सी चलाने को दी गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। फरवरी 2018 में उन्हें एचआरटीसी की बस शिमला से सोलन के लिए चलाने को दी गई।
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बिमला ठाकुर
- फोटो : संवाद
एक कॉल पर महिलाओं को टैक्सी सेवा उपलब्ध करवा रहीं बिमला
रात के समय घर जाने वाली कामकाजी महिलाओं की समस्या को शिमला की बिमला ठाकुर ने समझा। इन्होंने ऐसी महिलाओं के लिए रात को पिंक टैक्सी सेवा आरंभ की है। रात नौ से सुबह छह बजे तक यह सुविधा है। घर जाने वाली महिला को एक कॉल करनी होगी और उसे वाहन सेवा मिल जाएगी। बिमला ठाकुर एकल महिलाओं और उनके बच्चों के लिए कार्य कर रही हैं। वह द सोसायटी फॉर कनेक्टिव लाइवस संस्था चलाती हैं। महिलाओं के लिए इस तरह की सुविधा शुरू करने वाला शिमला प्रदेश का पहला शहर है। बिमला ठाकुर का कहना है कि यदि कोई महिला रात को कहीं फंस जाती है या उन्हें घर जाने के लिए कोई भी बस नहीं मिल रही है तो वह इस वाहन सुविधा का लाभ उठा सकती हैं। 20 फरवरी से शिमला में यह सुविधा शुरू हो गई है।
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नीता ठाकुर
- फोटो : संवाद
पहली बार भारत के लिए खेलीं और विश्व विजेता बनीं नीता राणा
खो-खो के वर्ल्ड कप विजेता टीम की सदस्य बन कुल्लू की नीता राणा अचानक सुर्खियों में आईं। खराहल के बेउगी गांव की नीता युवतियों के लिए प्रेरणा से कम नहीं हैं। नीता की कामयाबी को देखकर कुल्लू में दूसरी लड़कियां भी देश के लिए कुछ करने का जज्बे के लिए प्रेरित हो रही हैं। पहले ढालपुर मैदान में अभ्यास करने के लिए गिनी चुनीं लड़कियां ही आती थी। अब यह आंकड़ा बढ़ रहा है। नीता ने अपना खेल सफर 2014 में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला खराहल से राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग लेकर किया। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। 13 बार राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने के बाद भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला और पहली बार में विश्व विजेता बन गईं। नीता राणा के लिए एक समय ऐसा भी आया, जब वर्ष 2023-24 में चोट ने परेशान किया, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और मैदान से नहीं हटीं। नीता राणा मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखती हैं। पिता होमगार्ड से रिटायर्ड हैं और माता गृहिणी हैं। विश्व कप विजेता खोखो खिलाड़ी नीता राणा ने कहा कि मेरे लिए चंडीगढ़ जाना आसान नहीं था, लेकिन सब अच्छे के लिए होता है। किसी बच्चे में अगर हुनर है तो जरूरी है कि परिवार सहयोग करे।
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जिला परिषद अध्यक्ष डॉ. नीलम कुमारी
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3,000 युवतियों को नीलम सिखा चुकी हैं आत्मरक्षा के गुर
महिलाओं के उत्थान के लिए आज के समय में कई महिलाएं कार्य कर रही हैं। इनमें से एक महिला ऐसी हैं जो अब तक तीन हजार युवतियों को आत्मरक्षा के गुर सिखा चुकी हैं। बात जिला चंबा की रहने वाली जिला परिषद अध्यक्ष डॉ. नीलम कुमारी की हो रही है। वर्ष 2010 से उन्होंने यह अभियान शुरू किया। डॉ. नीलम कुमारी ने बताया कि वर्ष 2006 में उन्होंने जूडो कराटे सीखना शुरू किया। वर्तमान वे ब्लैक बेल्ट सेकंड डैन हैं। उन्होंने साहो और अपने वार्ड बख्तपुर की रहने वाली युवतियों को कराटे के गुर सिखाए ताकि युवतियां खुद अपनी सुरक्षा कर सकें। वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के दौरान भी डॉ. नीलम कुमारी का यह अभियान नहीं रुका।
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मंजरी
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पिता की संपत्ति के अधिकार को दिलाने के लिए लड़ रहीं मंजरी
किन्नौर के रिब्बा पंचायत की मंजरी पिछले कई सालों से महिलाओं को हक दिलाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। जनजातीय क्षेत्र में वाजिब उल अर्ज कानून लागू होने के कारण महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता है। यहां तक कि पति की जमीन पर भी उसका हक नहीं होता। अगर पति की मृत्यु हो जाए तो जमीन सीधे बेटों के नाम हो जाती है। उनका संघर्ष तब शुरू हुआ, जब वह 22 साल की थीं और गांव की प्रधान चुनी गईं। उनका कहना है कि जब रिब्बा पंचायत की प्रधान बनीं तो कई महिलाएं संपत्ति के मुद्दे को लेकर उनके पास आती थीं। उन्होंने इस मुद्दे पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की है। याचिका लंबित है।
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प्रधान अमिता कुमारी
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अमिता ने महिलाओं के साथ मिल छेड़ा नशा मुक्ति अभियान
मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र नादौन की झलाण पंचायत की प्रधान नशा मुक्ति अभियान चलाकर युवाओं को नशे से बचाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। प्रधान अमिता कुमारी ने पंचायत में बढ़ते नशे के मामलों और तस्करों की धरपकड़ के लिए महिला मंडलों की टीमें बनाईं हैं। अब प्रधान की ओर से नशा लेने के लिए प्रयोग होने वाले स्थानों पर कर्मचारियों को नियुक्त करने और सीसीटीवी कैमरे लगाने की कवायद शुरू करवाई है।
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पालमपुर की कमला कपूर
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प्रसव के समय खुद पालकी के सहारे पहुंचीं, प्रधान बनीं और अब हर वार्ड में है सड़क
पालमपुर की कमला कपूर ने महिला सशक्तीकरण की मिसाल पेश की है। अपने प्रसव के दौरान गांव में सड़क न होने के कारण उन्हें घर से मुख्य सड़क तक पालकी की मदद से पहुंचाया गया। उन्होंने उसी वक्त ठान लिया कि पंचायत के हर वार्ड को सड़क सुविधा से जोड़ेंगी। ढाई साल बाद वर्ष 1995 में 27 वर्ष की उम्र में पहली बार प्रधान का चुनाव लड़ा और जीत गईं। इसके बाद लगातार पालमपुर की चंदपुर पंचायत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उन्होंने अपनी पंचायत के सभी पांच वार्डों को सड़क सुविधा के साथ तो जोड़ा ही, बिजली-पानी जैसी अन्य सुविधाएं मुहैया करवाई हैं। इन कार्यों के लिए उन्हें कई बार सम्मानित भी किया गया है और 8 मार्च को शाहपुर में होने वाले राज्य स्तरीय कार्यक्रम के लिए भी उनका नाम भेजा गया है। कमला ने बताया कि 1995 में पहली बार चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। देवर के साथ पंचायती राज कार्यालय पहुंचीं। देवर को साथ देखकर डीपीओ ने कहा कि अगर अकेले आतीं तो क्या हो जाता। यह बात सुनकर ठान ली कि किसी पर निर्भर नहीं रहेंगी। कमला ने कटिंग ट्रेड में आईटीआई की है। उन्होंने महिलाओं को संदेश देते हुए कहा कि महिलाएं कमजोर न बनें और किसी पर निर्भर नहीं रहें।
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चिट्टे पर चोट के लिए मंडी में महिलाएं एकजुट
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चिट्टे पर चोट के लिए मंडी में महिलाएं एकजुट
मंडी जिले में बढ़ रहे नशे से युवाओं को बचाने के लिए माताएं ढाल बन गई हैं। बल्ह, सुंदरनगर, पंडोह, मंडी और जोगिंद्रनगर में नशे के खिलाफ महिलाओं के एकजुट होने का असर दिखने लगा है। कई पंचायतों में महिलाएं घर के कार्य से समय निकालकर सुबह-शाम युवाओं पर निगरानी भी रख रही हैं। कई खेतों में बैठकर नशीले पदार्थों का सेवन करने वालों की जानकारी पुलिस तक पहुंचा रही हैं। पंचायतों में होने वाली बैठकों में भी हिस्सा लेकर नशे के बढ़ते प्रचलन पर अधिकारियों से सवाल-जवाब कर रही हैं। नशा मुक्त मंडी की लड़ाई में महिलाएं भी आगे आई हैं। बल्ह की नलसर, कैहड़, बग्गी समेत कई पंचायतों में चिट्टे के संदिग्धों पर महिलाएं नजर रख रही हैं। नगर निगम मंडी में भी महिलाओं ने नशे के विरुद्ध मोर्चा खोल रखा है।
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योगिता गोयल
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हिमाचल, उत्तराखंड और राजस्थान में 12 होटल चला रहीं पांवटा की योगिता
योगिता गोयल को जीवन में मिली सफलता की यात्रा कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और उत्कृष्टता की खोज का प्रेरणादायक उदाहरण है। योगिता गोयल पांवटा साहिब के राजपुर की रहने वाली हैं। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा शिमला में पूरी की। इसके बाद उन्होंने आईएचएम चंडीगढ़ से होटल मैनेजमेंट में डिग्री प्राप्त की। वर्तमान में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान में 12 होटलों का संचालन कर रही हैं। अपनी पेशेवर उपलब्धियों के अलावा योगिता एक समर्पित मां भी हैं। उनके दो बच्चे हैं। रेयांश और चार साल की बेटी आरना। योगिता अपनी सफलता का श्रेय अपने पति मनीष गोयल को देती हैं, जो हर पहलू में उनके सबसे बड़े सहयोगी रहे हैं।
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नौकरी छोड़ फ्लोरीकल्चर में पेश की मिसाल
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नौकरी छोड़ फ्लोरीकल्चर में पेश की मिसाल, 5 राष्ट्रीय अवाॅर्ड
बिलासपुर के बैरी दड़ौला गांव की मीना चंदेल ने टीचर की नौकरी छोड़ पति के साथ फ्लोरीकल्चर का कार्य शुरू किया और फूलों की खेती में जो मिसाल कायम की है, वह किसी प्रेरणा से कम नहीं। मीना ने 400 लोगों का व्यवसाय शुरू कराया है और अपने फार्म में 22 लोगों को रोजगार दिया है। मीना के पति सुनील चंदेल ने 1999 में फूलों की खेती का कार्य शुरू किया। मीना चंदेल निजी स्कूल में टीचर थीं। 2012 में उन्होंने पति के साथ मिलकर कार्य करने का निर्णय लिया और नौकरी छोड़ दी। फ्लोरीकल्चर को नई ऊंचाई दी। उनका सालाना टर्नओवर 62 लाख रुपये का है। मीना को पांच राष्ट्रीय और दो क्षेत्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
35 हजार महिलाओं को दिखाई स्वरोजगार की राह
बिलासपुर की निर्मला ने मशरूम की खेती को स्वरोजगार का जरिया बनाया। करीब 35,000 महिलाओं को स्वरोजगार की राह दिखा चुकी हैं। निर्मला धीमान के सराहनीय प्रयासों के लिए 2021 में मशरूम रिसर्च सेंटर चंबाघाट ने राष्ट्रीय अवाॅर्ड से सम्मानित किया। निर्मला धीमान ने साल 2000 में 900 रुपये में 36 बैग खरीद कर मशरूम उत्पादन शुरू किया। पहली फसल से 35,000 रुपये मुनाफा कमाया। साल 2002 में 20 महिलाओं को जोड़कर स्वयं सहायता समूह बनाया। समूह को सरकार के आत्मा प्रोजेक्ट से जोड़ा। प्रोजेक्ट से 20,000 रुपये की सहायता राशि मिली। इससे समूह ने बड़े स्तर मशरूम का उत्पादन करना शुरू किया।