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नवरात्र विशेषः 250 वर्ष पुराना एक ऐसा मंदिर, जहां होते हैं अद्भुत चमत्कार

Fri, 22 Sep 2017 12:49 PM IST
amarujala.com- Presented by : अशोक चौहान
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शारदीय नवरात्र का आज दूसरा दिन है। आज हम आपको बता रहे हैं माता तारा के एक ऐसे मं‌दिर के बारें में, जिसका इतिहास 250 वर्ष पुराना है और यह मंदिर अद्भुत चमत्कारों  के लिए मशूहर है। मान्यता है कि इस मंदिर से कोई भक्‍त खाली हाथ नहीं जाता है। जीं हां शिमला से करीब 15 किलोमीटर दूर तरव पर्वत पर स्थित है माता भगवती तारा देवी का मंदिर। शोघी के पास कालका-शिमला राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे ऊंची पहाड़ी पर स्थित ये मंदिर चारों तरफ से खूबसूरत देवदार,बान अन्य तरह के वृक्षों से घिरा है।
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इस मंदिर का निर्माण लगभग 250 वर्ष पहले किया गया था। देवी तारा को पूर्वी राज्य बंगाल से हिमाचल प्रदेश में लाया गया था। ऐसी मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पहले सेन राजवंश के राजा ने इस क्षेत्र का दौरा किया। इस राजा ने अपने परिवार के देवता को एक छोटे सोने की मूर्ति के रूप में लाकेट में लाया था जो वह हमेशा अपनी ऊपरी बांह के आसपास पहनाता था। 
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कई सालों बाद इस राजवंश के दसवीं पीढ़ी के वंशज राजा भूपेंद्र सेन जब वे वर्तमान मंदिर के निकट घने जंगल में शिकार कर रहे थे तो उन्हें उनके परिवार के पवित्र देवता के दर्शन हुए।  देवी, "मा तारा" "द्वारपाल भैरव" और "हनुमान जी" के साथ राजा के समक्ष प्रकट हुई और भक्‍तों के सामने आने की तीव्र इच्छा व्यक्त जताई। इस पर राजा ने तुरंत मां तारा के नाम पर 50 ब‌िघा भूमि दान की और वहां एक मंदिर का निर्माण किया, जिसमें वैष्णव परंपराओं के अनुसार देवी की एक लकड़ी की मूर्ति स्थापित की गई।

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बाद में एक ही इसी राजवंश के राजा बलबीर सेन को  सपना आया जिसमें देवी ने तरव पार्वत की पहाड़ी पर स्थापित होने की इच्छा व्यक्त की।  भवानी दत्त नाम के एक पंडित की सलाह पर राजा ने अपनी राजधानी जुंगा में एक गुसानव कारीगर से 'अष्टधातु' से तैयार एक सुंदर मूर्ति बनवाई और 'शंकर' नामक एक हाथी पर रख कर तारव पर्वत तक पहुंचाया। 
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इस मूर्ति का विक्रमी संवत1825 को स्‍थापित किया गया। जो आज भी उसी भव्यता के साथ मंदिर में मौजूद है। क‌‌ियोंथल रियासत के सेन वंश आज भी हर साल शारदीय नवरात्रि के दौरान अष्टमी पर अपने परिवार के देवता माता तारा की पूजा करने की पुरानी परंपरा को पूरी निष्ठा और श्रद्धा से निभा रहा है। शारदीय नवरात्र में इसी दिन मंदिर परिसर में एक मेले का भी आयोजन किया जाता है। कुश्ती इस मेले की एक पुरानी परंपरा है।
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