हिमाचल में प्रचंड गर्मी पड़ने के साथ ही जंगल भी आग से दहकने लगे हैं। जंगल की आग से हर दिन बहुमूल्य वन संपदा जलकर राख हो रही है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस फायर सीजन में अब तक जंगल की आग के 523 मामले सामने आ चुके हैं।
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जंगल की आग
- फोटो : अमर उजाला
आग से अब तक 48 लाख 41 हजार 135 रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। जबकि कुल 2628.73 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ है। आग के सबसे ज्यादा मामले चीड़ के जंगलों वाले जिलों में सामने आ रहे हैं।
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बेकाबू हो चुकी जंगल की आग अब लोगों के घरों तक पहुंच रही है। शिमला में जंगल की आग बेकाबू होकर बंगाला कालोनी तक पहुंच गई। कड़ी मशक्कत के बाद अग्निशमन विभाग ने घरों को बचाया।
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जंगल की आग
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शिमला शहर के आसपास जंगलों में दो दिन से आग भड़की हुई है। इससे लाखों रुपये की वन संपदा को नुकसान पहुंचा है। राजधानी के यली, शौघी, तारादेवी, टुटू, धामी, कुफरी धार, जुन्गा में आग से काफी नुकसान हुआ है।
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जबकि टुटू और तारादेवी के जंगलों में लगी आग को काबू करना मुश्किल हो गया। मंगलवार को भी तारादेवी का जंगल धूं-धूं कर जलता रहा। इससे पूरा शहर काले धुंए के आगोश में आ गया।
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आग बुझाने के लिए तैनात विभाग की टीम
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वहीं वन विभाग के अनुसार प्रदेश के जंगल की आग को नियंत्रित करने के लिए फायर वाचर तैनात किए गए हैं। इस बार गृह रक्षकों की भी मदद ली जा रही है। संवेदनशील इलाकों में पानी के टैंकरों और अन्य वाहनों की तैनाती की गई है।
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जंगल की आग
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वन विभाग के मुख्य अरण्यपाल(वन संरक्षण एवं आग नियंत्रण) अशोक चौहान ने बताया कि जंगल की आग पर नियंत्रण के लिए प्रदेशभर में टीमें तैनात की गई हैं। साथ ही इस बार गृह रक्षकों की मदद भी ली जा रही है। उन्होंने कहा कि आग के मामलों की लगातार निगरानी की जा रही है।
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जंगल की आग के सबसे ज्यादा 124 मामले धर्मशाला वन वृत में दर्ज किए गए हैं। नाहन में 59, मंडी में 69, बिलासपुर में 42ए चंबा में 44, हमीरपुर 35, रामपुर 46, शिमला 43, सोलन 34 सहित वन्य प्राणी वृत शिमला और धर्मशाला में दो-दो मामले सामने आए हैं।
राजधानी शिमला के नजदीक तारादेवी के जंगलों में आग लगने से विश्व धरोहर कालका-शिमला रेल ट्रैक पर ट्रेनों के पहिये थमे रहे। मंगलवार दोपहर बाद रेल ट्रैक पर धुएं और आग की लपटें पहुंचने के बाद अप और डाउन ट्रेनें रोक दी गईं। सूचना पर रेलवे कर्मी मौके पर पहुंचे और आग पर काबू पाने के बाद ट्रेनों को रवाना किया गया। इससे पहले भी जंगल की आग के चलते ट्रेनों के पहिये थमे थे।