लेकिन स्वाति ने हार नहीं मानी। जब उन्होंने इस काम में वहां के पुरुषों को शामिल किया तो उन्हें उन आदमियों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। धीरे-धीरे गाने के माध्यम से महिलाओं ने स्वाति की बात को समझा। लेकिन अब स्वाति के सामने ये दिक्कत थी कि वो महिलाओं को सस्ते में पैड कैसे उपलब्ध करवाएं।
तब स्वाति ने इस बारे में नेट पर बता किया। इंटरनेट पर रिसर्च किया, तो पता चला कि कोयमबटूर के अरुणाचलम मोरुगनानाथाम सेनेटरी नैपकिन का एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो सस्ता होने के साथ ही काफी इफेक्टिव भी है। मैंने उस मॉडल को समझा और गाँव की कुछ महिलाओं को भी समझाया और फिर पैड्स बनाने की ट्रेनिंग शुरू कर दी।
लेकिन अब महिलाओं के सामने इन पैड्स को फेंकने की दिक्कत थी। क्योंकि गांव के पुरुषों को लगता था कि अगर ये गंदे पैड्स गांव में फेंके जाएंगे तो इससे खेत की मिट्टी खराब होगी।
स्वाति की इस परेशानी का हल निकाला उनके इंजीनियर पति ने। उन्होंने ऐसी मशीन तैयार की जो इन पैड्स को आसानी से डिस्पोज कर देती थी वो भी इकोफ्रेंडली तरीके से। कम लागत में तैयार इस मशीन को गांववाले भी आसानी से खरीद सकते थे।