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International Women:s Day 2020: क्या भारत में औरतों को मर्दों के बराबर अधिकार हैं?

Sun, 08 Mar 2020 09:47 AM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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women - फोटो : Pixabay
बीबीसी ने देश के 14 राज्यों में 10,000 से ज़्यादा लोगों से जब ये सवाल पूछा तो 91 फ़ीसदी ने 'हां' में जवाब दिया। शोध में हिस्सा लेनेवाले लोगों में से दो-तिहाई का मानना है कि पिछले दो दशक में बराबरी बढ़ी है और बड़ी संख्या में लोगों के मुताबिक़ औरतों की जिंदगी अब मर्दों जितनी ही अच्छी है।ग्रामीण और कम समृद्ध लोगों के मुताबिक तो औरतों की जिंदगी अब मर्दों से बेहतर हो गई है। ऐसा लगता है कि सभी लोग सैद्धांतिक तौर पर समान हकों के पक्ष में हैं और ऐसा महसूस करते हैं कि भारत में औरतों के लिए बहुत अच्छा समय है। पर क्या ऐसा हुआ है?


 
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- फोटो : Pixabay
#MeToo और युवाओं की लड़ाई
समानता की ये छवि बनने के पीछे कई वजहें हैं। हाल में #MeToo जैसे आंदोलन जिसने ऊंचे पदों और ताकत के दुरुपयोग को चुनौती दी और ये जाहिर किया कि यौन उत्पीड़न कितना व्यापक है। पिछले कुछ दशक में महिला आंदोलनकारियों और नौजवानों ने सरकारों को बेहतर क़ानून लाने पर मजबूर किया है। जैसे निजी जिंदगी से जुड़े कानून जैसे पैतृक संपत्ति में हक, तलाक, गोद लेने इत्यादि से लेकर क्रिमिनल लॉ जिसमें यौन हिंसा को बेहतर तरीके से परिभाषित किया गया है और न्याय प्रक्रिया की रफ्तार तेज करने की कोशिश की गई है। इन कोशिशों के बावजूद, औरतों की जिंदगी के अनुभव बताते हैं कि उन्हें मर्दों जैसे अधिकार नहीं हासिल हैं। बीबीसी के शोध में पूछे गए सवालों के जवाबों से इस विरोधाभास की परतें खुलती हैं।


 
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- फोटो : pixabay
अब भी इतना सब कुछ झेलती हैं औरतें
भारत में लगातार गिरता बच्चों का लिंगानुपात ये जाहिर करता है कि अब भी लड़कियों के मुकाबले लड़के की चाहत प्रबल है। साल 2011 के आंकड़ों के मुताबिक ये लिंगानुपात आजादी के बाद अपने सबसे कम स्तर पर आ गया है। हमारी अदालतों पर काम का दबाव ज्यादा है और कानून में बलात्कार के मामलों को फास्ट-ट्रैक अदालतों में चलाए जाने के प्रावधान के बावजूद सुनवाई तयशुदा वक्त में पूरी नहीं होती है। यौन उत्पीड़न के मामलों को साबित करना बहुत मुश्किल है और औरतों को इनकी सुनवाई के अलावा जवाब में किए गए मानहानि के मुकदमों से भी जूझना पड़ता है। गर्भावस्था के दौरान जरूरी सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाओं की अब भी कमी है। यूनीसेफ (UNICEF) के मुताबिक दुनियाभर में रोज 800 औरतों की गर्भावस्था से जुड़ी ऐसी बीमारियों से मौत होती हैं जो बेहतर सुविधाओं से रोकी जा सकती थीं। इनमें से 20 फीसदी औरतें भारत से हैं।
वर्ल्ड बैंक के ताजा आंकड़ों के मुतबिक भारत में 15 साल से ज्यादा की उम्र की औरतों में से सिर्फ एक-तिहाई ही कामकाजी हैं। ये दुनियाभर में कामकाजी औरतों की सबसे कम दरों में से है।

 

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- फोटो : women
बराबरी का मतलब समझते हैं लोग?
बीबीसी के शोध में पूछे गए सवालों के जवाबों से ये साफ होता गया कि समान अधिकारों की चाहत तो है पर व्यावहारिक तौर पर उसका मतलब क्या है उसकी समझ नहीं है। तीन-चौथाई से ज्यादा लोगों ने ये माना कि औरतें अगर चाहें या उन्हें जरूरत हो तो उन्हें घर के बाहर काम करना चाहिए पर एक-तिहाई मानते हैं कि शादी के बाद औरतों का काम करना ठीक नहीं है।



 
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- फोटो : Pixabay
शोध में पता चलता है कि औरतों के लिए बेहतर माने जानेवाले राज्य, जैसे तमिल नाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और मिज़ोरम में कामकाजी औरतों की दर ज़्यादा है, बिहार, उत्तर प्रदेश और गुजरात में काफी कम। सभी लोगों के जवाब देखें तो एक बहुत छोटी दर ही मानती है कि औरतें अपनी ख्वाहिश से काम करती हैं। ज्यादातर मानते हैं कि वो घर में पैसों की किल्लत को पूरा करने के लिए नौकरी करती हैं। ज्यादातर ये भी मानते हैं कि औरत की जगह घर के अंदर होती है। क्योंकि वो घर से बाहर निकलें तो घर के काम पर बुरा असर पड़ता है और सुरक्षा के लिहाज से चिंताएं बढ़ती हैं।



 
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- फोटो : Pixabay
हिंसा से जुड़ी परेशान करने वाली राय
अगर नौकरियां कम हों, तो लोगों का मानना है कि मर्दों को पहला मौका देना चाहिए। महिलाएं तक ऐसा मानती हैं। जिससे ये जाहिर होता है कि औरतों को घरेलू भूमिका में देखनेवाली सोच कितनी गहरी है। लड़कियों के मुकाबले लड़के की चाहत से शोध में लोग इनकार करते हैं पर एक बड़ा तबका मानता है कि युनिवर्सिटी के स्तर पर शिक्षा पाने का हक़ लड़कियों से ज़्यादा लड़कों का है। मणिपुर, जहां स्त्रियों को परिवार में प्रधान मानने का प्रचलन है, वहां के ज़्यादातर लोगों ने कहा कि उच्च शिक्षा पाने का हक बराबरी से मिलना चाहिए। शोध में सबसे परेशान करने वाली राय औरतों के खिलाफ हिंसा से जुड़ी है। अधिकांश लोग ये मानते हैं कि यौन हिंसा बढ़ी है (जो तथ्य है) पर ये भी कहते हैं कि औरतों को परिवार को साथ रखने के लिए हिंसा बर्दाश्त करनी चाहिए।

 
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थोड़ा बदलाव है, थोड़े की जरूरत है
शोध ये इशारा करता है कि भारत में औरतों के अधिकारों को समझने के तरीके में बदलाव आ रहा है। औरतें परिवार और घर के बाहर अपनी भूमिका के दायरे बढ़ा रही हैं। पर उनकी जिंदगियों पर उनका इख्तियार बढ़े उसके लिए दूसरों का नियंत्रण कम करना होगा। अधिकारों का यही लेन-देन समझना मुश्किल है और इसीलिए जिंदगी में इसका अमल धीमा। पर अगर समझने की कोशिश हो और रूढ़िवादी सोच को बदलने की चाहत, तो बदलाव आखिरकार जरूर आएगा।
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