नेहा बताती हैं, '' मेरी तीन बहनें हैं और मैं परिवार में सबसे छोटी हूं। पिता शराब बहुत पीते थे जिसके चलते घर का माहौल अच्छा नहीं रहता था. पिता की तरफ़ से आर्थिक मदद भी ज़्यादा नहीं मिल पाती थी। इस बीच मेरी एक दोस्त ने बताया कि हॉकी खेलने से मुझे अच्छे जूते, कपड़े पहनने को मिलेंगे।''
नेहा ने उस वक़्त अच्छे कपड़े-जूतों के लिए हॉकी खेलना शुरू किया। फिर एक जिला स्तर का मुकाबला जीतने के बाद उन्हें दो हज़ार रुपए का ईनाम मिला जिसके बाद उन्हें लगा कि शायद इस खेल के जरिए वह अपने घर की आर्थिक हालत सुधार सकती हैं।
पिता इस खेल में नेहा को बढ़ावा नहीं देना चाहते थे, पर मां ने अपनी बेटी का पूरा साथ दिया। वह बताती हैं कि उनके घर के आसपास रहने वाले लोगों ने मां को बहुत बार हिदायत दी कि 'बेटी को यूं बाहर मत निकालों, कहीं कोई उठाकर कभी ले जाए तो?'मां ने समाज के तानों से ऊपर अपनी बेटी और उसके खेलने के जज्बे को रखा।