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Rajasthan: प्रेमिका से विवाह के लिए एक रात में खोद दी थी नक्की लेक, रसिया बालम ने रच दिया था इतिहास; जानें

Fri, 14 Feb 2025 04:07 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सिरोही

सार

सिरोही के हिल स्टेशन माउंटआबू में एक से बढ़कर एक पर्यटन स्थल है जो देशी एवं विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। इनमें शहर का हार्ट नक्कीलेक मुख्य है। इसको लेकर 2 कहावतें प्रचलित है। क्या है इसके पीछे की कहानी आइये जानते हैं।
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नक्की लेक - फोटो : अमर उजाला
गुजरात सीमा से सटे सिरोही जिले में स्थित हिल स्टेशन माउंटआबू माउंटआबू को राजस्थान का कश्मीर भी कहा जाता है। समुद्र तल से करीब 1200 मीटर ऊंचाई पर स्थित यहां की नक्कीलेक माउंटआबू आने वाले देशी एवं विदेशी पर्यटकों के खासा आकर्षण का केंद्र बनी है। नक्कीलेक ढाई किलोमीटर की परिधि में फैली है। नक्कीलेक के चारों ओर मनोरम पहाड़ियां है जो इसकी सुंदरता में चार चांद लगा रही है।
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नक्की लेक - फोटो : अमर उजाला

माउंटआबू रेल, सड़क एवं हवाई मार्ग से पहुंचा जा सकता है। हवाई मार्ग से माउंट आबू आने के लिए उदयपुर या अहमदाबाद एयरपोर्ट आना हाेगा। उदयपुर से माउंटआबू करीब 185 किलाेमीटर एवं अहमदाबाद से माउंटआबू की दूरी 228 किलोमीटर है। दोनों एयरपोर्ट से आसानी से माउंटआबू के लिए टैक्सी सुविधा उपलब्ध है। इसके साथ ही सड़क मार्ग से आने वाले के लिए भी राजस्थान के प्रमुख शहरों से बस एवं टैक्सी की सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा रेल मार्ग से आने वाले लोगो के सबसे नजदीक स्टेशन आबूरोड है जो कि माउंट आबू से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर है।

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नक्की लेक - फोटो : अमर उजाला

अधूरी प्रेम कहानी की निशानी है नक्की लेक
नक्की लेक को लेकर यहां प्रसिद्ध किवदंती के मुताबिक यहां के राजा ने अपनी बेटी के विवाह के लिए शर्त रखी थी कि जो भी व्यक्ति एक रात में बिना किसी औजार के झील खोद देगा, उसी से राजकुमारी का विवाह करवाया जाएगा। जिस पर रसिया बालम नाम के शिल्पकार ने इस शर्त को पूरा कर अपने नाखूनों से एक रात में नक्की लेक को खोद दी। लेकिन, राजा की मां ने रात में ही मुर्गे की आवाज निकाल दी। जिससे रसिया बालम को लगा, वह शर्त हार गया है।

इस अधूरी प्रेम कहानी के बाद माउंट आबू की इस झील का नाम नख की नक्की लेक पड़ा। बाद में समय के साथ इसका नाम नक्की लेक हो गया। यहां देलवाड़ा जैन मंदिर के पीछे कुंवारी कन्या व रसिया बालम का मंदिर बना हुआ है। लेटिटिया एलिजाबेथ लैंडन ने 1839 में आबू के माउंटेन-लेक पर एच. मेलविले हिंदू टेम्पल्स द्वारा बनाई गई एक पेंटिंग का काव्यात्मक चित्रण किया गया था।

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नक्की झील - फोटो : अमर उजाला

देवताओं ने नाखूनों से खोदी थी नक्की लेक
कहावत है कि नक्की लेक का निर्माण देवताओं ने अपने नाखूनाें से खोद कर किया था। इसीलिए इसका नाम नक्की लेक पड़ा था। शुरू में इसे नख की झील कहा जाता था। समय के साथ बदल कर इसका नाम नक्की झील पड़ गया। आसपास काफी खाने-पीने व खरीदारी के लिए दुकानें हैं। यहां पारम्परिक वेशभूषा में फोटो खींचवाने के लिए भी कई दुकाने हैं। गांधी वाटिका से प्रवेश करने के बाद अंदर बोट हाउस बना हुआ है, जहां बोटिंग के लिए शिकारा बोट व पैडल बोट का पर्यटक आनंद ले सकते हैं। नक्की लेक में एक फव्वारा लगा हुआ, जिससे निकलने वाले पानी की धार करीब 70-80 फीट ऊंचाई तक जाती है। नक्की झील में राजस्थान के अलावा देश-विदेश से पर्यटक यहां के नजारों का लुत्फ उठाने आते है।

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नक्की लेक - फोटो : अमर उजाला

नाममात्र के किराए में उपलब्ध है बोटिंग सुविधा
नक्की लेक में आधे घंटे पैडल बोट से बोटिंग के प्रति व्यक्ति 236 रुपए और शिकारा बोट में प्रति व्यक्ति 300 रुपए चार्ज रहता है। वहीं, स्पेशल शिकारा बोट व स्पेशल पैडल बोट में आधे घंटे 472 रुपए प्रति व्यक्ति चार्ज रहत है। माउंटआबू पहुंचने के लिए आप रोड से रेलवे स्टेशन आ सकते हैं। यहां से करीब 21 किलोमीटर सड़क मार्ग से माउंटआबू नक्की लेक पहुंच सकते हैं। 

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