नक्की लेक
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अधूरी प्रेम कहानी की निशानी है नक्की लेक
नक्की लेक को लेकर यहां प्रसिद्ध किवदंती के मुताबिक यहां के राजा ने अपनी बेटी के विवाह के लिए शर्त रखी थी कि जो भी व्यक्ति एक रात में बिना किसी औजार के झील खोद देगा, उसी से राजकुमारी का विवाह करवाया जाएगा। जिस पर रसिया बालम नाम के शिल्पकार ने इस शर्त को पूरा कर अपने नाखूनों से एक रात में नक्की लेक को खोद दी। लेकिन, राजा की मां ने रात में ही मुर्गे की आवाज निकाल दी। जिससे रसिया बालम को लगा, वह शर्त हार गया है।
इस अधूरी प्रेम कहानी के बाद माउंट आबू की इस झील का नाम नख की नक्की लेक पड़ा। बाद में समय के साथ इसका नाम नक्की लेक हो गया। यहां देलवाड़ा जैन मंदिर के पीछे कुंवारी कन्या व रसिया बालम का मंदिर बना हुआ है। लेटिटिया एलिजाबेथ लैंडन ने 1839 में आबू के माउंटेन-लेक पर एच. मेलविले हिंदू टेम्पल्स द्वारा बनाई गई एक पेंटिंग का काव्यात्मक चित्रण किया गया था।