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Rajasthan: पटवों की पांच हवेलियां जिन्हें बनाने में लगे 50 साल, यहां से हुआ था पालीवाल ब्राह्मणों का पलायन, देखें तस्वीरें 

Sun, 29 May 2022 02:13 PM IST
उदित दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जैसलमेर

सार

 Rajasthan tourist places
 
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जानिए जैसलमेर के बारे में। - फोटो : सोशल मीडिया
थार मरूस्थल के बीच बसा राजस्थान का जैसलमेर अपनी पीले पत्थर की इमारतों के लिए जाना जाना चाहता है। 'गोल्डन सिटी' के नाम से मशहूर यह शहर पाकिस्तान की सीमा और थार रेगिस्तान के पास है। जैसलमेर किला शहर का सबसे प्रमुख पर्यटन स्थल है। इसे सोनार किला (द गोल्डन फोर्ट) भी कहा जाता है।

इसके अंदर दुकानें, होटल और प्राचीन हवेलियां (घर) आज भी मौजूद हैं, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी लोग रहते आ रहे हैं। इसके अलावा भी जैसलमेर की कई ऐसी खासियत हैं, जो आपको जाननी चाहिए। आज हम आपको यहां के 12 प्रमुख पर्यटन स्थल और शहर के इतिहास के बारे में बताएंगे, आइए जानते हैं...
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जैसलमेर का किला - फोटो : सोशल मीडिया
जैसलमेर का किला
यह किला एक वर्ल्ड हैरिटेज साइट है। थार मरूस्थल के त्रिकुटा पर्वत पर बना यह किला बहुत सी ऐतिहासिक लड़ाइयों का गवाह रहा है। पीले बलुआ पत्थरों से बना यह किला सूरज की रोशनी पड़ते ही सोने जैसा चमकने लगता है। इसीलिए इसे सोनार किला या गोल्डन फोर्ट भी कहा जाता है। यह एक विश्व धरोहर स्थल भी है। फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म फेलुदा के साथ कई अन्य फिल्मों की शूटिंग इस किले में की गई है। हर साल फरवरी महीने में यहां डेजर्ट फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है।
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नथमल जी की हवेली - फोटो : सोशल मीडिया
नथमल जी की हवेली
दीवान मोहता नथमल जैसलमेर राज्य में प्रधानमंत्री थे। उनके रहने के लिए यह हवेली बनाई गई थी। 19वीं शताब्दी  महारावल बेरीसाल और हाथी और लूलू नाम के दो वास्तुकार भाइयों ने इस हवेली का निर्माण किया था। हवेली के मुख्य दरवाजे पर दो पत्थर के हाथी देखकर लगता है कि यह आपके स्वागत के लिए खड़े हैं।  

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जैसलमेर सरकारी संग्रहालय - फोटो : सोशल मीडिया
जैसलमेर सरकारी संग्रहालय
यह संग्रहालय जैसलमेर आने वाले पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। इस संग्रहालय में प्रदेश के राज्य पक्षी गोडावण की ट्रॉफी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। यहां 7वीं और 9वीं शताब्दी की परंपरागत घरेलू वस्तुओं, रॉक-कट क्रॉकरी, आभूषण और प्रतिमाएं आदि भी मौजूद हैं। 
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सालिम सिंह की हवेली - फोटो : सोशल मीडिया
सालिम सिंह की हवेली
300 साल पुरानी यह हवेली मोर के पंखों जैसी गोलाई लिए छज्जों और मेहराबों से सजी है। इसमें जैसलमेर के एक दुर्जेय प्रधानमंत्री सालिम सिंह का निवास था। इस हवेली का निर्माण 18वीं शताब्दी की शुरुआत में किया गया था। इसका एक हिस्सा अब भी इसके वंशजों के अधीन है। ऊंचे मेहराबदार छत में खांचे बांटकर मोर के आकार से अलंकरण तैयार किए गए हैं। कहा यह भी जाता है कि, यहां दो लकड़ी की मंजिलें भी थी, जो इसे महाराजा के महल के समान ऊंचाई प्रदान करती थीं। हालांकि, बाद में इसे तोड़ दिया गया। 
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पटवों की हवेली - फोटो : सोशल मीडिया
पटवों की हवेली
इस हवेली के अंदर पांच हवेलियां हैं, जिन्हें गुमान चंद पटवा ने अपने पांच बेटों के लिए 1805 में बनवाया था। इसे बनाने में 50 साल लग गए थे। शहर की सबसे बड़ी और सबसे खूबसूरत पांच मंजिला हवेली एक संकरी गली में गर्व से खड़ी है। अब यह हवेली अपनी उस भव्य महिमा को खो चुकी है।  
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मंदिर पैलेस - फोटो : सोशल मीडिया
मंदिर पैलेस
इसे ताजिया टॉवर भी कहा जाता है। यह महल ताजिए की शेप में बना हुआ है। 200 साल तक यह महल जैसलमेर के शासकों का निवास स्थान था। इसके बादल विलास नाम के हिस्से को शहर की सबसे ऊंची इमारत माना जाता है। अब इसे हेरिटेज होटल के रूप में संचालित किया जा रहा है।  

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लोद्रवा जैन मंदिर - फोटो : सोशल मीडिया
लोद्रवा जैन मंदिर
इस मंदिर का भव्य शिखर दूर से नजर आता है। मान्यता है कि यहां लगे कल्प वृक्ष को छूकर जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह पूरी होती है। मंदिर के गर्भगृह में सहस्रफण पार्श्वनाथ की श्याम मूर्ति है, जो कसौटी पत्थर से बनी हुई है। ये मंदिर प्रसिद्ध जैन संतों (ऋषभदेव जी और शंभवदेव जी) के रूप में जाना जाता है, जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है। इसके अलावा भी शहर में कई जैन मंदिर हैं। 

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बड़ा बाग - फोटो : सोशल मीडिया
बड़ा बाग
यह विशाल पार्क भाटी राजाओं की स्मृतियों को समेटे हुए है। इसे बरबाग भी कहा जाता है। इस बगीचे में जैसलमेर राज्य के पूर्व महाराजाओं जय सिंह द्वितीय सहित अन्य राजाओं की शाही छतरियां हैं। यहां से पर्यटकों को सूर्यास्त का अद्भुत नजारा भी देखने को मिलता है। महाराजा जय सिंह द्वितीय ने 1688 में एक बांध बनवाया था, जिससे जैसलमेर का काफी हिस्सा हरा भरा हो गया था। उनकी मृत्यु के बाद 1743 में उनके पुत्र लूणकरण ने अपने पिता की छतरी यहां बनवाई थी। जिसके बाद अन्य राजाओं की मृत्यु के बाद उनकी भी छतरियां यहां बनाई गईं।

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डेजर्ट नेशनल पार्क - फोटो : सोशल मीडिया
डेजर्ट नेशनल पार्क
थार रेगिस्तान के विभिन्न वन्यजीवों का सबसे अच्छा पार्क है। यहां रेत के टीले, नमक झीलों और अंतर मध्यवर्ती क्षेत्रों का गठन किया गया है। जानवरों की कई प्रजातियां जैसे काले हिरण, चिंकारा और रेगिस्तान में पाई जाने वाली लोमड़ी ये सभी पार्क में विचरण करते हैं। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जो दुनिया का सबसे बड़ी उड़ान भरने वाले पक्षियों में से एक है उसे भी यहां देखा जा सकता है। सर्दी की सीजन में पार्क में हिमालयी और यूरेपियन ग्रिफोन वाल्टर्स, पूर्वी इंपीरियल ईगल और स्केलेर फॉल्कन जैसे पक्षी यहां विहार करते हैं। 

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कुलधरा - फोटो : सोशल मीडिया
कुलधरा
पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा इन गांवों का निर्माण 13वीं शताब्दी के आसपास किया गया है। सुनसान जंगल के बीच काफी बड़े क्षेत्र में फैले खंडहरों में आधी अधूरी दीवारें, दरवाजे, खिड़कियां दिखाई देते हैं। यहां 84 गांव थे जिन्हें पालीवाल ब्राह्मणों ने रातों रात छोड़ दिया था। जिनमें से कुलधरा और खावा सबसे प्रमुख हैं। इनके बारे में कई किवदंतियां प्रचलित हैं, लेकिन यह तक सामने नहीं आया कि इन गांवों से पलायन क्यों हुआ? लोगों का कहना है कि यह जगह शापित है और आतंक के डर से यहां बसावट नहीं होती है। 

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जैसलमेर वॉर म्यूजियम - फोटो : सोशल मीडिया
जैसलमेर वॉर म्यूजियम
जैसलमेर मिलिट्री बेस पर सैनिकों द्वारा दिए गए बलिदान और उनके शौर्य को दर्शाने के लिए इस म्यूजियम को बड़े सलीके से सजाया गया है। यहां प्रदर्शित प्रत्येक वस्तु उन सैनिकों के बलिदान को मूर्तरूप से उजागर करती है, जिन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध और 1971 में हुए लोंगेवाला युद्ध के दौरान शहीद हुए थे। यहां भारतीय सेना द्वारा अधिग्रहित टैंक और युद्ध में काम आए अन्य सामान रखा हुआ है। यहां एक ऑडियो-विज़ुअल कक्ष भी है जिसमें युद्ध संबंधी फिल्में दिखाई जाती हैं।

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लोंगेवाला वॉर मेमोरियल - फोटो : सोशल मीडिया
लोंगेवाला वॉर मेमोरियल
4 दिसंबर 1971 के भारत पाकिस्तान जंग के दौरान लोंगेवाला का युद्ध भारतीय सैनिकों का सबसे बड़ा साहसिक कार्य था। बहादुरी सैनिकों ने पाकिस्तान के लगभग 2000 सैनिकों और 60 टैंकों को खदेड़ दिया था। यह मेमोरियल देश की उस जीत का जश्न मनाने के लिए बनाया।
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शहर में एक अमर सागर लेक भी है। - फोटो : सोशल मीडिया
क्या है शहर का इतिहास?
शहर का इतिहास 12वीं शताब्दी पूर्व से मिलता है। देवराज के रावल और सबसे बड़े वारिस रावल जैसल के एक छोटे सौतेले भाई को लोदुरवा का सिंहासन दे दिया गया था। अतः वे अपना राज्य स्थापित करने के लिए नया स्थान खोजने लगे। जब वे ऋषि ईसल के पास आए तो ऋषि ने उन्हें भगवान कृष्ण की भविष्यवाणी के बारे में बताया। जिसमें उन्होंने कहा गया था, यदुवंश के वंशज इस स्थान पर एक नया राज्य बनाएंगे। 1156 में रावल जैसल ने मिट्टी के किले का निर्माण करवाया, जिसका नाम जैसलमेर रखा गया। जैसल ने इसे अपनी राजधानी घोषित कर दिया। जैसलमेर में पिछले 800 साल के इतिहास की गाथाएं छिपी हुई हैं।
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