7वीं शताब्दी में राजा अजयपाल चौहान ने अजमेर की स्थापना 'अजय मेरू' नाम से की थी। यह शहर 12वीं सदी के अंत तक चौहान वंश का केंद्र रहा। 1193 ई. में मोहम्मद गौरी के आक्रमण और पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद मुगलों ने अजमेर को अपना ईष्ट स्थान माना। यहां सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की एक दरगाह भी है। जिसे गरीब नवाज की दरगाह के नाम से जाना जाता है।
कहा जाता है कि इस दरगाह में मुस्लिमों से ज्यादा हिंदू धर्म के लोग आते हैं। इसके अलावा भी शहर में कई धार्मिक और पर्यटन स्थल है। आज हम आपको शहर के 10 बड़े पर्यटन स्थलों के बारे में बताएंगे। आइए जाते हैं...
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अजमेर शरीफ दरगाह
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अजमेर शरीफ दरगाह
यह शहर का सबसे बड़ा दर्शनीय स्थल हैं। यहां देशी और विदेशी पर्यटक ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर मन्नत मांगने और चादर चढ़ाने आते हैं। सिर्फ मुस्लिम ही नहीं अन्य धर्मों के लोगों में बड़ी संख्या में यहां आते हैं। दरगाह में तीन मुख्य दरवाजे हैं। मुख्य द्वार 'निजाम दरवाजा' कहलाता है। इसे हैदराबाद के नवाब ने बनवाया था। शाहजहां द्वारा बनवाया गया दूसरे द्वार को 'शाहजहां दरवाजा' और महमूद खिलजी द्वारा बनवाए गए तीसरे द्वार को 'बुलंद दरवाजा' कहा जाता है। उर्स के दौरान दरगाह पर झंडा चढ़ाने की रस्म के बाद प्रसाद बनाया जाता है। जिसे भक्त लोग प्रसाद के तौर पर बांटते हैं। आश्चर्य की बात है कि यहां केवल शाकाहारी भोजन ही पकाया जाता है।
मेयो कॉलेज
भारतीय राजघरानों के बच्चों के लिए यह बोर्डिंग स्कूल हुआ करता था। 1875 ई. में रिचर्ड बॉर्क ने मेयो कॉलेज की स्थापना की थी। इसके पहले प्राचार्य के रूप में नोबेल पुरस्कार विजेता, प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक रूडयार्ड किपलिंग के पिता जॉन लॉकवुड किपलिंग ने इसका राज्य चिंह बनाया, जिसमें भील योद्धा को दर्शाया गया था। इस भवन का स्थापत्य इंडो सार्सेनिक (भारतीय और अरबी) शैली का एक शानदार उदाहरण है। संगमरमर से बना यह भवन अत्यंत आकर्षक है।
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अढ़ाई दिन का झोपड़ा
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अढ़ाई दिन का झोपड़ा
अढ़ाई दिन का झोपड़ा कहलाने वाली इमारत एक संस्कृत महाविद्यालय था। 1198 ई. में मुहम्मद गोरी ने इसे मस्जिद में बदल दिया था। कहा जाता है कि इस इमारत को महाविद्यालय से मस्जिद में बदलने में सिर्फ ढाई दिन लगे थे। इसलिए इसका नाम 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' पड़ गया।
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आनासागर झील
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आनासागर झील
इस कृत्रिम झील को 1135 से 1150 ई. के बीच राजा अजयपाल चौहान के पुत्र अरूणोराज चौहान ने बनवाया था। इन्हें 'अन्ना जी' के नाम से पुकारा जाता था। इस कारण इसका नाम आना सागर झील नाम रखा गया। यह पर्यटकों के लिए एक आकर्षण का केंद्र है।
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सोनी जी की नसियां
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सोनी जी की नसियां
19वीं सदी में निर्मित यह जैन मंदिर भारत के समृद्ध मंदिरों में से एक है। इसके मुख्य कक्ष को स्वर्णनगरी का नाम दिया गया है। इसका प्रवेश द्वार लाल पत्थर से और अंदर संगमरमर की दीवारें बनी हैं। जिन पर काष्ठ आकृतियां तथा शुद्ध स्वर्ण पत्रों से जैन तीर्थंकरों की छवियां और चित्र भी बने हुए हैं।
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फॉय सागर झील
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फॉय सागर झील
अरावली पर्वतमाला की छवि इस कृत्रिम झील में देखी जा सकती है। 1892 ई. में अंग्रेज इंजीनियर मिस्टर फॉय ने इस झील को बनवाया था। यहां का शांत वातावरण पर्यटकों के मन को सुकून देता है।
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नारेली जैन मंदिर
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नारेली जैन मंदिर
श्री ज्ञानोदय जैन तीर्थ के नाम से पहचान रखने वाला यह जैन मंदिर पारंपरिक और समकालीन वास्तुकला का उत्तम नमूना है। इसके आसपास 24 लघु देवालय हैं, जिन्हें 'जिनालय' के नाम से जाने जाते है। दिगम्बर जैन समुदाय के लिए यह एक प्रमुख तीर्थ स्थल है।
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तारागढ़ किले का प्रवेशद्वार
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तारागढ़ किले का प्रवेशद्वार
यह भव्य शानदार मुख्य प्रवेश द्वार एक पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ है। किसी जमाने में बेहद शानदार रहे इस भव्य किले में बनाए गए पानी के कृत्रिम जलाशय, भीम बुर्ज और गर्भ गुंजम नामक तोप यहां की मुख्य विशेषता है। यहां पर एक रानी महल भी है। इस किले को राजपुताना वास्तुशिल्प का अतुल्य उदाहरण माना जाता है।
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किशनगढ़ का किला
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किशनगढ़ का किला
यह एक भव्य किला है। यहां पर्यटकों के देखने के लिए जेल, अन्न भंडार, शस्त्रागार के साथ कई अन्य इमारतें भी हैं। किले के अंदर बना 'फूल महल' राठौड़ वंश के शासकों के वैभव को दर्शाता है। यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
आनासागर बारादरी
यह एक झील है। इसके किनारे संगमरमर के मंडप बने हुए हैं, जिन्हें बारादरी (बारहदरी) कहा जाता है। यहां एक दौलत बाग भी है जिसे शाहजहां और जहांगीर ने बनवाया था।