यहां है फौजिया का घर
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आर्थिक स्थिति और सरकारी सहायता
फौजिया के परिवार को इस काम के लिए दरगाह से एक तय खर्च मिलता है, जिसे बारूद सरफा कहा जाता है। पहले उनके पिता को ढाई रुपये मिलते थे। अब यह खर्च 3,000 रुपये प्रति महीना हो गया है। साथ ही, सालाना 5,000 रुपये मेडिकल सहायता के रूप में मिलते हैं। फौजिया कहती हैं कि सम्मान की बात करें तो लड़की होकर तोप चलाने के बावजूद उन्हें वह मान्यता नहीं मिलती, जो एक महिला पायलट या एथलीट को मिलती है।
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वे कहती हैं, लड़कियां हवाई जहाज उड़ाती हैं, गाड़ी चलाती हैं, खेलों में भाग लेती हैं और उन्हें सम्मान मिलता है। लेकिन मैं अकेली महिला तोपची होने के बावजूद वह सम्मान नहीं पाती। इसका दुख है, लेकिन गरीब नवाज ने जो दिया है, उसके लिए शुक्रगुजार हूं।
नई पीढ़ी को सिखाने की जिम्मेदारी
अब फौजिया अपनी नौ साल की भतीजी सहर को भी तोप दागना सिखा रही हैं। वे कहती हैं, मैं खानदान की पहली लड़की थी जिसने तोप चलाई, लेकिन आखिरी नहीं होऊंगी। फौजिया खान का जीवन साहस, समर्पण और परंपरा के प्रति गहरी निष्ठा का प्रतीक है। वे न सिर्फ अपनी खानदानी जिम्मेदारी निभा रही हैं, बल्कि इस विरासत को अगली पीढ़ी तक भी पहुंचा रही हैं। चाहे समाज की रूढ़ियां हों या सम्मान की कमी, फौजिया ने हर चुनौती का सामना किया है और अजमेर की इस ऐतिहासिक परंपरा को जीवित रखा है।