पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब में हर साल माघ के महीने में मकर संक्रांति पर माघी मेले का आयोजन किया जाता है। यह स्थान पहले खिदराने की ढाब के नाम से जाना जाता था। सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने चालीस सिहों के नाम पर इस स्थान को मुक्ति का सर नाम दिया था जो बाद में मुक्तसर हो गया। मेला माघी श्री गुरु गोबिंद सिंह महाराज के चालीस सिंहों की याद को समर्पित होता है।
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गुरुद्वारा श्री तंबू साहिब।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
सिख इतिहास के अनुसार बिक्रमी संवत 1761 में दशम पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी किला आनंदपुर साहिब में मुगल सेनाओं से युद्ध लड़ रहे थे। किले में राशन-पानी समाप्त होता जा रहा था। 40 सिख योद्धाओं ने गुरु जी से निवेदन किया कि वह भूखे प्यासे नहीं लड़ सकते। गुरु जी ने कहा कि यदि आप जाना चाहते हैं तो मुझे लिख कर दो कि गुरु गोबिंद सिंह हमारे गुरु नहीं और हम उनके शिष्य नहीं हैं। व्याकुल सिंहों ने उपरोक्त पक्तियां लिख कर गुरु जी को दे दी और अपने घर लौट गए।
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गुरुद्वारा श्री टिब्बी साहिब।
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कुछ दिन बाद गुरु जी ने किला आनंदपुर साहिब छोड़ दिया और चमकौर साहिब की गढ़ी में जा पहुंचे, जहां मुगल सेनाओं का मुकाबला करते हुए गुरु जी के दो बड़े साहिबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह शहीदी को प्राप्त कर गए। इसके बाद गुरु जी ने वहां से खिदराने की ढाब के पास ऊंची रेतीली टिब्बी पर अपना डेरा लगा लिया। दूसरी और श्री आनंदपुर साहिब में गुरु जी को छोड़ कर घर लौटे 40 सिंहों ने घरवालों को पूरी बात बताई तो घरवालों ने उन्हें खूब कोसा और कहा कि उन्हें मुसीबत के समय गुरु जी का साथ नहीं छोड़ना चाहिए था। उनकी माताओं, बहनों और पत्नियों ने कहा था कि आप सभी लोग घरों में बैठो, हम गुरु जी की सेना बन कर युद्ध करने जाते हैं।
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गुरुद्वारा श्री तंबू साहिब।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
घरवालों के ताने सुनकर 40 सिंह माई भागो के नेतृत्व में वापस गुरु जी की खोज में निकल पड़े। खोजते-खोजते यह सिंह खिदराने पहुंचे और वहां एक जलाशय देख कर अपने डेरे लगा लिए। गुरु जी का पीछा करते-करते जब मुगल सेना भी खिदराने आ पहुंची तो उन्होंने वहां झाड़ियों पर सिंहों के सूख रहे वस्त्रों को देख कर यह अंदाजा लगा लिया कि यहां पर गुरु जी की सेना ने तंबू लगाए हुए हैं। यह सोच कर मुगल सेना ने 40 सिंहों पर आक्रमण कर दिया। 40 सिंह योद्धा भी चारों और से मुगलों पर भूखे शेर की भांति टूट पड़े। इस युद्ध में 39 सिंह शहीद हो गए।
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मेला माघी।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
भाई महां सिंह गंभीर घायलवस्था में भूमि पर तड़प रहे थे। इसी दौरान गुरु जी उनके पास आए और उनका सिर अपनी झोली में रखकर कहा कि आप सबने सिखी की लाज रखी है। इसलिए महां सिंह जो मांगना चाहते हो, मांग लो। इस पर भाई महां सिंह ने अंतिम निवेदन किया कि गुरु जी हमें और कुछ नहीं चाहिए, बस आप हमारे द्वारा श्री आनंदपुर साहिब में लिखा गया वह कागज का टुकड़ा फाड़ कर हमें क्षमा दान दो और हमारी टुट्टी गांठ दो। इस पर गुरु जी ने अपने कमर से वह बेदावा निकाला और उसे फाड़ कर कहा कि तुम्हारी गुरु जी से टुट्टी गंडी गई है। इसके बाद गुरु जी ने कहा कि यह स्थान खिदराना नहीं बल्कि मुक्ति का स्थान है। जो व्यक्ति इस पवित्र धरती के तीर्थ स्थलों के दर्शन करेगा और इस टुट्टी गंडी के पवित्र सरोवर में स्नान करेगा, उसे मुक्ति प्राप्त होगी। तभी से चालीस सिंह 40 मुक्तों के नाम से प्रसिद्ध हैं और खिरदाने की ढाब मुक्तसर के नाम से जाना गया।
वह पेड़, जिस पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपना घोड़ा बांधा था।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बाद में गुरु जी ने सभी सिंहों की मृत देहों को रणभूमि से एकत्र किया और एक बड़ी चिता तैयार कर अपने हाथ से उनका अंतिम संस्कार किया। जहां पर 40 सिंह शहीद हुए थे, उस स्थान का नाम तभी से मुक्तसर पड़ गया और जिस स्थान पर गुरु जी ने 40 सिंहों की मृत देह का संस्कार किया, वहां पर अब गुरुद्वारा शहीद गंज साहिब स्थित है। जहां पर बेदावा फाड़ा था वहां पर गुरुद्वारा श्री टूट्टी गंडी साहिब और जहां पर तंबू लगे थे वहां पर श्री तंबू साहिब गुरुद्वारा है। ऊंची टिब्बी के स्थान पर आज श्री गुरुद्वारा टिब्बी साहिब स्थित है। गुरुद्वारा श्री टुट्टी गंडी साहिब परिसर में आज भी वो विशाल पेड़ लगा हुआ है, जहां पर गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने युद्ध के दौरान अपने घोड़े को बांधा था।