मुंबई में 2 फरवरी 2014 से ऊंचे खंभों पर चलने वाली मोनो रेल सेवा शुरू हो चुकी है। मोनो रेल की शुरुआत को नई पहल कहा जा रहा है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि देश की पहली मोनो रेल पंजाब में चली थी। मोरिंडा से सरहिंद के बीच 15 मील का सफर तय करने वाली यह दुनिया की शुरुआती मोनो रेल सेवा में से एक थी। 114 साल पहले पटियाला रियासत के तत्कालीन महाराजा व पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री के दादा महाराजा भूपिंदर सिंह ने इसकी कल्पना की थी। जिसे ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बाउल्स ने डिजाइन किया था। आज इसे राष्ट्रीय रेल संग्रहालय में न सिर्फ देखा जा सकता है, बल्कि इसके रोमांचक सफर का आनंद भी उठाया जा सकता है। मूल रूप से मोनो रेल का अर्थ है, जिसका एक पहिया लोहे की पटरी पर चलता हो और दूसरा सड़क पर। इस तरह की मोनो रेल भारत में सबसे पहले पटियाला रियासत के महाराजा भूपिंदर सिंह ने अपनी रियासत में चलवाई थी। उस समय सड़क के एक तरफ सिंगल रेल ट्रैक था। रेल ट्रैक लगभग 95 प्रतिशत भार वहन करता था और सड़क पर 5 प्रतिशत भार पड़ता था। मजेदार बात यह है कि इस मोनो रेल को कोई इंजन नहीं बल्कि खच्चर खींचते थे। बाद में इसमें स्टीम इंजन लगाया गया।
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मोनो रेल
- फोटो : अमर उजाला
मोरिंडा से सरहिंद के बीच मोनो रेल सेवा 1907 में शुरू हुई और दो दशक तक अपनी सेवा देती रही। इसे 1927 में बंद कर दिया गया। तत्कालीन पटियाला रियासत में रेल सेवा के लिए कुल 80 किलोमीटर की दो लाइनें बिछाई गई थीं। इसकी कंपनी का नाम पटियाला स्टेट मोनो रेल ट्राम वे (पीएसएमटी) था। केरल के मुन्नार में कांडला वैली रेल भी इसी तरह की मोनो रेल सेवा थी। हालांकि 1908 में ही कांडला वैली मोनो रेल को नैरोगेज में बदल दिया गया पर पटियाला मोनो रेल 1927 तक सरपट दौड़ती रही। मोनो रेल में सफर के लिए 1908 में किराया महज आधा आना हुआ करता था। यह किराया इस रेल के पूरे सफर के लिए था। मालढुलाई का किराया एक आना से शुरू होता था। इसके 1927 में बंद होने तक किराया यही रहा। इस रेल नेटवर्क की लोकप्रियता का ये आलम था कि सरहिंद मोरिंडा लाइन में 1908 में तकरीबन 20 हजार लोग इस रेल पर हर महीने सफर किया करते थे।
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मोनो रेल।
- फोटो : अमर उजाला
रेल म्यूजियम में हर बुधवार और रविवार को यह रेल चलाई जाती है। इसके लिए प्रति व्यक्ति 200 रुपये की टिकट रखी गई है। इसके सवारी डिब्बे पूरी तरह लकड़ी के बने हुए हैं, जो किसी बग्घी के जैसे लगते हैं। मोनो रेल का सफर बंद होने के बाद कई दशक तक इसकी सुध नहीं ली गई। कई कोच तो यूं ही पड़े पड़े कबाड़ में तब्दील हो गए। रेलों के इतिहास में रूचि रखने वाले लेखक माइक स्टा ने 1962 में इन्हें ढूंढ निकाला। बाद में उनके प्रयास से पटियाला मोनो रेल के कुछ कोच और लोकोमोटिव को अमृतसर के रेल यार्ड में संरक्षित किया गया। दिल्ली में रेल म्यूजियम बनाए जाने के बाद इसे दिल्ली लाया गया।
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मोनो रेल
- फोटो : अमर उजाला
मोनो रेल जिस मार्ग पर चलती थी वह पंजाब का कनक ( गेहूं) उत्पादन करने वाला इलाका है। इस रेल से न सिर्फ लोग सवारी करते थे बल्कि इसमें कनक भी ढोई जाती थी। कनक ढोने के लिए अलग से कोच थे। मतलब मोनो रेल मालगाड़ी का काम भी करती थी। छोटे छोटे गांव से रेलगाड़ी में कनक लाद कर इसे मंडी तक पहुंचाया जाता था। किसानों के लिए कनक ढुलाई के लिए यह एक सस्ते विकल्प के तौर पर मौजूद थी। 1912 के बाद पंजाब की सड़कों पर मोटर वाहन आने लगे थे। इनकी स्पीड मोनो रेल से अधिक थी। इस कारण एक अक्तूबर 1927 को महाराजा पटियाला ने मोनो रेल को बंद करने का फैसला किया। इसका एक इंजन पीएसएमटी 4 रेल म्यूजियम में आराम फरमा रहा है। 2013 में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन विनय मित्तल के कार्यकाल में रेलवे ने एक बार फिर इसका संचालन शुरू कराया। दो फरवरी 2013 में इसको रिस्टोर करके संचालित किया गया। 2019 से इसे हर रविवार और बुधवार को चलाया जा रहा था। साल 1980 में आई बीआर चोपड़ा की फिल्म द बर्निंग ट्रेन में इस मोनो रेल को दिखाया गया था।
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मोनो रेल
- फोटो : अमर उजाला
मोनो रेल में 0-3-0 माडल का लोको इस्तेमाल हुआ। ये ओरेनस्टीन एंड कोपेल (ओ एंड के) द्वारा बनाया गया था। बर्लिन की कंपनी से इंजन 500 और 600 पाउंड में खरीदा गया था। रेल के सुचारू संचालन के लिए कुल चार लोकोमोटिव खरीदे गए थे। डोनाल्ड डब्लू डीकेन्स अपने लेख में लोको के बारे में बताते हैं कि दाहिने तरफ का वाटर टैंक बड़ा था इसलिए इंजन का वजन लोहे की पटरी पर चलने वाले पहिए पर शिफ्ट कर जाता था। पटरी वाले पहिए का व्यास 39 इंच (990 एमएम) था। लोकोपायलट के खड़े होने की जगह में अच्छा खासा केबिन स्पेस भी हुआ करता था। मोनो रेल के कोच 8 फीट लंबे और 6 फीट चौड़े हुआ करते थे। जब शुरुआत हुई तब इसके पास 15 पैसेंजर कोच और मालगाड़ी के 75 डिब्बे थे। इनमें कुछ माल गाड़ी के डिब्बे ऐसे भी थे जिन्हें जरूरत पड़ने पर सवारी डिब्बे में भी बदल दिया जाता था।
महाराजा भूपिंदर सिंह को अपने राज्य की जनता के लिए अनूठी रेल सेवा शुरू करने का ख्याल आया। इस परियोजना के चीफ इंजीनियर कर्नल सी डब्लू बावेल्स बनाए गए। कर्नल बावेल्स इस तरह के मोनो रेल तकनीक का प्रयोग पहले भी बंगाल नागपुर रेलवे में माल ढुलाई के ट्रैक के लिए कर चुके थे। महाराजा भूपिंदर सिंह ने उन्हें पीएसटीएम प्रोजेक्ट का मुख्य इंजीनियर नियुक्त किया। इस रेल के बग्घियों के खींचने के लिए रियासत में पाले गए 560 खच्चरों का इस्तेमाल किया गया। खच्चरों के अलावा इस मोनो रेल में बैलों और सांडों का भी इस्तेमाल किया गया। पीएसएमटी के बारे में 1908 के इंपेरियल गजट के अलावा कहीं कोई जानकारी नहीं मिलती है। इसमें लिखा गया है कि1907 में भारत में एक मोनो रेल सेवा आरंभ की गई है जो मोरिंडा को सरहिंद शहर से जोड़ती है।