चीन में आधिकारिक तौर पर नास्तिकता को अपनाया गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ चीन की 70 फ़ीसदी आबादी नास्तिक है और बाक़ी आबादी का बड़ा हिस्सा बौद्ध और ताओ धर्म को मानने वालों का है। सार्वजनिक जगहों पर चीन में शायद ही कभी कोई धार्मिक अनुष्ठान होता है। लेकिन हाल ही में चीन की राजधानी बीजिंग के एक फ़ाइव स्टार होटल में कीर्तन और नाच-गाने का आयोजन होते देखा गया। इस आयोजन में 250 लोगों से ज़्यादा लोग शामिल थे। इनमें ज़्यादतर चीनी थे और थोड़े-बहुत स्थानीय भारतीय निवासी थे। पूरी रिपोर्ट-एसडी गुप्ता/वरिष्ठ पत्रकार, बीजिंग
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नास्तिक चीन में अब बज रही 'हरे कृष्णा, हरे हरे' की घंटी
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कीर्तन और नाच-गाने का यह कार्यक्रम तीन घंटों तक चला। भारत से गए हरे कृष्णा पंथ के अनुयायियों के संगत में यह आयोजन हो रहा था। सौ से ज़्यादा चीनी महिलाएं रंगीन सलवार-क़मीज़ में अमरीकी संत कविचंद्र स्वामी के साथ हरे कृष्णा हरे हरे जप रही थीं। भारत से आए लोकनाथ स्वामी मधुर भजन के साथ उनका साथ दे रहे थे। मौजूद चीनी लोगों में से ज़्यादातर साफ़-साफ़ कीर्तन का उच्चारण कर रहे थे जो चीनी भाषी लोगों के लिए एक आसान काम नहीं है। लोकनाथ स्वामी ने कहा, "चीन में आध्यात्म को लेकर गहरी लालसा है। हालात बदल रहे हैं। हम चीनी लोगों में कृष्ण कीर्तन को लेकर उत्साह देख रहे हैं।"
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नास्तिक चीन में अब बज रही 'हरे कृष्णा, हरे हरे' की घंटी
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कई लोग इसे सरकार के नरम रवैए की तरह देख रहे हैं जिसके बारे में कुछ दिनों पहले तक सोचा भी नहीं जा सकता था। लेकिन स्थानीय हरे कृष्णा पंथ से जुड़े गौड़िया जो कि एक योग शिक्षक है, का अलग मानना है। उन्होंने कहना है, "हम योग भक्ति का अभ्यास करते हैं। हम कोई धार्मिक क्रियाकलाप नहीं कर रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि योग सिर्फ़ शारीरिक क्रिया है। हमने उन्हें योग का एक बड़ा उद्देश्य बताया है।"
नास्तिक चीन में अब बज रही 'हरे कृष्णा, हरे हरे' की घंटी
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चीन में कीर्तन पर लोगों को नाचते हुए देखना एक अविश्वसनीय दृश्य है। गौड़िया कहते हैं, "चीनी लोग हरे कृष्णा के दर्शन को ख़ुद के लिए मुश्किल नहीं पाते हैं। ये बिल्कुल चीनी विचार 'बा के टीँ' और 'फेंग एई येव जीआ' की तरह है जिसका मतलब होता है प्यार और समर्पण।" वहां मौजूद लगभग सारे लोगों ने 'भगवद भजन' की चीनी कॉपी 'बु जीआन फेन गे' ली जो कि प्रवेश शुक्ल 200 युआन( क़रीब 2000 रुपए) के साथ मुफ़्त दिया जा रहा था।