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18 महीने में 30 देश, मोदी के दौरों से देश को क्या मिला?

Sat, 21 Nov 2015 02:21 PM IST
ज़ुबैर अहमद / बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी ब्रिटेन और टर्की के दौरे से वापस लौटे ही थे कि वो अब आज से मलेशिया और सिंगापुर के दौरे पर हैं। इससे एक बार फिर उनके आलोचक सवाल करेंगे कि बार-बार विदेशी दौरों की जरूरत क्यों? उनकी मांग है कि प्रधानमंत्री को देश में रह कर घरेलू समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। मलेशिया में वो 13वें आसियान-इंडिया और 10वें पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। (ज़ुबैर अहमद /बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली)
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सम्मेलनों के इलावा मलेशिया और सिंगापुर का दौरा एक द्विपक्षीय यात्रा भी है। सत्ता में आने के बाद से अब तक वो 28 देशों का सफर कर चुके हैं। सिंगापुर का पड़ाव 30वां है।
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उनकी ब्रिटेन यात्रा पर रिपोर्टिंग करने मैं भी वहां गया था। मैंने उनके आलोचकों के सवाल उन प्रवासी भारतीयों के बीच रखे जो मोदी को अपना हीरो मानते हैं। अधिकतर लोगों के अनुसार प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं जरूरी हैं।

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महाराष्ट्र के एक व्यक्ति बिर्मिंघम की एक मस्जिद से जुड़े हैं। उनके अनुसार प्रधानमंत्री की यात्राओं से वैश्विक समुदाय के बीच देश का कद ऊंचा हुआ है।उसी शहर के एक मंदिर के पुजारी ने कहा कि उनकी यात्राओं से प्रवासी भारतीयों को उनके देश के अंदर बल मिला है, उनका प्रोफाइल बढ़ता है और दूसरी तरफ वो भारत से अधिक निकट आते हैं।
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प्रवासी भारतीयों के अनुसार नरेंद्र मोदी उनसे जुड़ने के लिए और उनके प्रोफाइल को ऊंचा करने के लिए विंबले और मैडिसन स्क्वायर मैदान जैसी शानदार सभाएं करते हैं।
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बीते शुक्रवार को लंदन के विंबले स्टेडियम के बाहर एक गुजराती प्रवासी ने कहा, "पहले जब भारत के प्रधानमंत्री आते थे तो केवल लंदन में रहने वाले भारतीयों से मिलकर लौट जाते थे। आज पूरे ब्रिटेन से लोग उन्हें सुनने आए हैं। मैं खुद मेनचेस्टर से आया हूँ।"पिछले 18 महीनों में मोदी की विदेश यात्राओं पर एक निगाह डालें तो प्रवासी भारतीयों से उनके जुड़ने वाला तर्क समझ में आता है।
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एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 2014 में विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने भारत को 70 अरब डॉलर भेजे। जबकि पिछले साल भारत आने वाली प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की राशि 35 अरब डॉलर थी।इसके इलावा भारतीय मूल के लोग जिन देशों से पैसे भेजते हैं उन में 10 सब से अधिक पैसे भेजने वाले देशों में संयुक्त अरब अमीरात, अमरीका, ब्रिटेन और कनाडा शामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी इन सब देशों का दौरा कर चुके हैं। जहाँ तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का सवाल है तो तीन सब से अधिक निवेश करने वाले देशों में मॉरीशस, सिंगापुर और ब्रिटेन सब से आगे हैं।

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सिंगापुर की यात्रा के पीछे इस सच को सामने रखना ज़रूरी है।भारत सरकार के अनुसार प्रधानमंत्री की यात्राओं के कारण विदेशी निवेश में बढ़ोतरी हुई है। सरकार का दावा है कि 2015 में दुनिया भर में भारत में
सब से अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया है। मोदी ने अपनी यात्राओं के दौरान कई बार कहा है कि प्रवासी भारतीयों से जुड़ने का कारण उनका भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहन करना है। मोदी के समर्थक कहते हैं कि प्रधानमंत्री की विदेशी यात्राओं का मकसद भारत को निवेश के लिए 'सुधरते माहौल और सुविधाओं' वाले देश के रूप में बेचना है।

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वो कहते हैं कि प्रधानमंत्री निजी फायदे के लिए विदेशी दौरे नहीं करते हैं बल्कि देश की गरिमा बढ़ाने के लिए ये यात्राएं करते हैं।आम धारणा ये है कि वो देश के अंदर अधिक यात्राएं नहीं करते लेकिन पिछले 18 महीनों में वो लगभग सभी राज्यों का दौरा कर चुके हैं। ये बात और है कि उनके कई दौरे चुनावी सभाओं से संबंधित होते हैं।

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प्रधानमंत्री के आलोचक कहते हैं कि बस अब बहुत हुआ। अब देश के अंदर रह कर समस्याओं पर ध्यान दें। पिछले कुछ महीनों में भारत में बढ़ती असहिष्णुता पर रोक लगाने में नाकाम रहने पर उनकी कड़ी आलोचना की गयी है। हालांकि उन्होंने बढ़ती असहिष्णुता पर बातें की हैं।

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ब्रिटेन में भी उन्होंने कहा था कि विविधता भारत की शक्ति है लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि जिस दोषसिद्धि के साथ उन्हें ये बातें करनी चाहिए वो नहीं करते हैं। आलोचक कहते हैं कि उनकी विदेशी यात्राओं के बावजूद मोदी अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते मजबूत करने में असफल रहे हैं। वो नेपाल दो बार जा चुके हैं।

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भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश भी गए हैं लेकिन पड़ोसियों से रिश्ते पहले से अधिक मजबूत नहीं हुए हैं। बल्कि
नेपाल के साथ रिश्ते पहले से खराब हुए हैं। नरेंद्र मोदी शनिवार से मलेशिया और सिंगापुर के दौरे पर हैं।
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उनके आलोचकों को शायद उनकी विदेश यात्राओं पर ऐतराज करने का एक और अवसर मिलेगा। हाल में मोदी के एक आलोचक ने चुटकी लेते हुए कहा, "नरेंद्र मोदी देश के पहले एनआरआई प्रधानमंत्री हैं।"
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