सब जानते हैं कि सूखा किसान की उपज खा जाता है और उसको और परिवार को एक ऐसे आर्थिक संकट में उलझा देता है जिससे वो कभी नहीं निकल पाता।
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देखिए देश के भविष्य के लिए कितना खतरनाक है सूखा
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बारिश न होने का असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर भी पड़ता है।
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सैम ह्यूस्टन स्टेट यूनिवर्सिटी के संतोष कुमार और यूनिवर्सिटी ऑफ पसाऊ की रमोना मोलिटर ने पड़ताल में पाया कि सूखाग्रस्त इलाकों के बच्चों का वजन कम होता है।
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वैसी माओं के बच्चे, जिन्होंने प्राइमरी से आगे पढ़ाई नहीं की है, इससे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
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लड़कियों में खासतौर पर हीमोग्लोबिन के स्तर गिरने का खतरा और बढ़ जाता है।
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शाह और स्टाइनबर्ग ने 2013 में पाया कि मॉनसून और बारिश में उतार-चढ़ाव बच्चों की जिंदगी पर सीधा असर डालते हैं।
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बच्चों की पैदाइश और उनकी चार साल की उम्र के दौरान पड़ने वाले सूखे के चलते वो उम्र के मुताबिक स्कूली शिक्षा में सामंजस्य नहीं बैठा पाते या कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देखते।
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महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाके अंबाजोगाई की योगेश्वरी शिक्षण संस्था से जुड़ीं शैलजा भारतराव बरूड़े ने मराठवाड़ा के सूखाग्रस्त इलाकों में बच्चों और महिलाओं की स्थिति के बारे में एक सर्वेक्षण किया है। इसमें कई बातें सामने आईं।
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सूखे का असर बच्चियों की शिक्षा पर पड़ रहा है।
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लड़कियों को परिवार के लड़कों के मुकाबले पढ़ाई में कम तरजीह दी जा रही।
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बहुत से बच्चे इस साल स्कूल नहीं पहुंच पाए हैं।
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बारिश न होने से माता-पिता के पास फीस के पैसा नहीं है।
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बच्चों की जीवनशैली में भी बदलाव देखा जा रहा है।
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उनके खाने-पीने की आदतें बदल रही हैं और अक्सर किसान माता-पिता उन्हें पौष्टिक आहार नहीं दे पाते।
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उपज न होने और आर्थिक परेशानियों के चलते घरों में हिंसा की वारदात भी बढ़ी हैं।
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कई बार महिलाओं और बच्चों को हिंसा का सामना भी करना पड़ता है।यंग लाइव्स लॉन्गीट्यूडिनल सर्वे के तहत 2002 और फिर 2006-07 के बीच आंध्र प्रदेश में सूखे और नक्सली हिंसा के चलते बच्चों की सेहत पर असर के बारे में एक सर्वेक्षण किया गया था।
इस सर्वेक्षण के मुताबिक सूखे से सबसे ज्यादा अगर कोई प्रभावित होता है तो वो छोटे बच्चे होते हैं, जिनके शारीरिक विकास पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है।(सभी फोटो-बीबीसी हिंदी)