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उस 'आजाद' को नमन, जिसके नाम से कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत

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आजादी की लड़ाई का वह योद्धा जो कभी अंग्रेजों से नहीं डरा, जिसके नाम से ही ब्रिटिश सरकार थर-थर कांपती थी, जिसने अपनी पूरी जवानी देश के नाम कर दी, उस अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की आज जयंती है।
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उस 'आजाद' को नमन, जिसके नाम से कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत

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23 जुलाई 1906 को जन्मे आजाद 17 साल की उम्र में ही क्रांतिकारी संगठन 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ में शामिल हो गए थे। देश के लिए उनके जोश और जज्बे को देखकर संगठन में दूसरे क्रांतिकारी उन्हें ‘क्विक सिल्वर’ (पारा) नाम से बुलाते थे।
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क्रांतिकारियों के संगठन 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ में धन की बेहद कमी थी इसलिए संगठन के लिए धन इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी चंद्रशेखर आजाद को ही दी गई थी।

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संगठन के लिए चंद्रशेखर आजाद कितने संजीदा थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगठन में धन की कमी के कारण सर्दियों में भी वे केवल पुराने अखबार बिछाकर जमीन पर सोते थे।
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चंद्रशेकर आजाद वेश बदलने में बहुत माहिर थे। कई बार क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम देने के बाद आजाद वेश बदलकर पुलिस के सामने से निकल जाते थे और कोई उन्हें पहचान तक नहीं पाता था।
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एक दिन चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद के 'अल्फ्रेड पार्क' में एक दोस्त के साथ बैठे थे। एक मुखबिर की सूचना पर अंग्रेज पुलिस ने उन्हें पार्क में ही घेर लिया। आजाद ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया, लेकिन जब उनकी गोलियां खत्म होने को आई तो अंतिम गोली से उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।
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आजाद अक्सर अपने मित्रों से कहा करते थे, "दुश्मन की गोलियों का डटकर सामना करेंगे, आजाद 'आजाद' थे और 'आजाद' ही मरेंगे।'' और उन्होंने ये करके भी दिखाया।
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चंद्रशेखर आजाद 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के हर क्रांतिकारी कार्य में सबसे आगे रहे। सांडर्स वध और सेंट्रल असेंबली में भगत सिंह के बम फेंकने जैसी बड़ी घटनाओं में भी चंद्रशेखर ने अहम भूमिका निभाई।
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