आज हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का 148वां जन्मदिन मना रहे हैं। देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलवाने में मोहनदास करमचंद गांधी का अहम योगदान रहा है।
(तस्वीरें: एमकेगांधी.कॉम)
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146वीं जयंती पर देखिए, मोहनदास के गांधी बनने की यात्रा
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अपने परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे गांधी बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गए। जहां से वह 24 साल की उम्र में दक्षिण अफ्रीका चले गए और करीब 21 साल तक वहीं रहे। वहीं से गांधी ने अपने पहले आंदोलन की शुरुआत की और बाद में भारत आ गए।
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महात्मा गांधी दांडी मार्च के दौरान समर्थकों के साथ। ब्रिटिश सरकार की नमक पर करनीति के विरोध में 12 मार्च 1930 में इस पदयात्रा की शुरुआत हुई थी।
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महात्मा गांधी और गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर एक साथ बैठे हुए।
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महात्मा गांधी देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलवाने के लिए जो लड़ाई लड़ रहे थे, उनमें उनकी पत्नी कस्तुरबा गांधी ने हर कदम उनका साथ दिया। एक पैदल यात्रा के बाद महात्मा गांधी के पैरों को साफ करती हुई।
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यह तस्वीर 28 अप्रैल 1938 की है जब महात्मा गांधी मोहम्मद अली जिन्ना के साथ बैठक करने के लिए उनके मुंबई स्थित आवास पहुंचे थे।
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अफगानिस्तान में गफ्फार खान महात्मा गांधी के भाषण का अनुवाद कर जनता को समझाते हुए।
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सितंबर 1945 में पूना के खड़गवासला गांव में जनता के लिए खोले गए एक अस्पताल का उद्घाटन करने के दौरान।
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बीमारी से जुझ रहे मदन मोहन मालवीय से मुलाकात करते हुए। यह मुलाकात 1946 में अप्रैल महीने में हुई थी। इस मुलाकात के कुछ महीनों बाद ही महामना ने इस संसार को अलविदा कह दिया था।
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई जहाज दुर्घटना में हुई मौत की खबर के बाद 9 दिसंबर 1945 को महात्मा गांधी नेताजी बोस के घर पहुंचे। कहा जाता है कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को हुई थी हालांकि ये फिलहाल विवाद का विषय बना हुआ है।
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आजादी के कुछ महीने पहले मार्च 1947 में एक दृष्टिहीन ग्रामीण से बातचीत करते हुए। इस ग्रामीण ने बिहार राहत कोष में अपना योगदान दिया था।
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लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी से दिल्ली में मुलाकात करते हुए। यह मुलाकात 31 मार्च 1947 में हुई थी।
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आजादी के कुछ ही महीनों बाद नाथुराम गोडसे ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह हत्या 30 जनवरी 1948 को उस वक्त की गई जब वह अपने अनुयायियों के साथ प्रार्थना के लिए जा रहे थे।
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महात्मा गांधी की हत्या की खबर से पूरा देश शोकाकुल हो गया। उनकी अंतिम यात्रा में हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। 31 जनवरी 1948 को गांधी के अंतिम संस्कार में जाते हुए राजपथ का नजारा।