बॉलीवुड डायरेक्टर एक के बाद एक फिल्में बनाते रहते हैं। कुछ ऐसी जो सदियों तक याद रह जाती हैं तो कुछ ऐशी जिन्हें कुछ मिनट भी झेलना मुश्किल हो जाता है। लेकिन खास बात यह है कि इन सारे निर्देशकों की एक खास शैली होती है और एक ही थीम पर ये अक्सर फिल्में बनाते हैं। देखिए तो, क्या है इनकी खासियत।
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तस्वीरें: इन निर्देशकों ने बार बार किया वही काम, फिर भी नहीं माने
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मधुर भंडारकर अक्सर फिल्म, कॉरपोरेट और फैशन जगत के पीछे की सच्चाई को उजागर करने वाली फिल्में बनाते हैं। हाल ही में आई कैलेंडर गर्ल्स भी ऐसी ही एक फिल्म है। इसके अलावा फिल्म फैशन, हीरोइन, पेज3, कॉरपोरेट इस बात का सबूत हैं।
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संजय लीला भंसाली की ज्यादातर फिल्मों में बड़े बड़े आलीशान सेट, भारी भरकम कपड़े और लार्जर दैन लाइफ वाला तड़का होता है। जैसे देवदास, ब्लैक, सांवरिया, हम दिल दे चुके सनम, हाल ही में आई रामलीला और जल्द आने वाली फिल्म बाजीराव मस्तानी।
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इम्तियाज अली अक्सर रिलेशनशिप को अलग अलग ढंग से दिखाने वाली फिल्में बनाते हैं। जैसे रॉकस्टार, लव आजकल, कॉकटेल, आने वाली फिल्म तमाशा। ये सभी फिल्में प्यार और दोस्ती को एक खास तरह से दिखाती हैं।
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करण जोहर को आज के जमाने का रोमांटिक डायरेक्टर कहना गलत नहीं है। उनकी ज्यादातर फिल्मों में भरपूर रोमांस होता है। चाहे कभी खुशी कभी गम हो या कभी अलविदा न कहना या स्टूडेंट ऑफ द ईयर।
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डेविड धवन को तो कॉमेडी का सरताज कहा ही जाता है। उनके जैसी मजाकिया फिल्में शायद ही कोई बना पाए। हीरो नं 1, हसीना मान जाएगी, मैंने प्यार क्यों किया, मुझसे शादी करोगी, राजा बाबू, कुली नं 1, दुल्हन हम ले जाएंगे, मैं तेरा हीरो और न जाने कितनी कॉमेडी फिल्में इसका सबूत हैं।
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अब्बास मस्तान को थ्रिलर फिल्में बनाने में महारत हासिल है। उनकी इन फिल्मों में वाकई जबरदस्त सस्पेंस होता है कि आपको अंत में दंग कर देते हैं। बाजीगर, अजनबी, हमराज, ऐतराज, रेस, नकाब, प्लेयर्स उनकी कुछ बेहतरीन थ्रिलर फिल्में हैं।
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सूरज बड़जात्या ने हमेशा से ही अपनी फिल्मों में पारिवारिक एकता, शादी और रिश्तों की अहमियत को समझाया है। हम साथ साथ हैं, हम आपके हैं कौन, विवाह, एक विवाह ऐसा भी उनकी कुछ खास फिल्में हैं जिन्होंने इस परिभाषा को पूरा किया है। देखते हैं उनकी आने वाली फिल्म प्रेम रतन धन पायो कैसी होती है।
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रोहित शेट्टी कॉमेडी और ऐक्शन फिल्में बनाने पर ध्यान देते हैं। उनकी कॉमेडी फिल्मों में भी कहीं न कहीं एक्शन जरूर मिलेगा। जैसे गोलमाल रिटर्न्स के गाने 'था कर के' में। उनकी ऐसी ही फिल्में हैं सिंघम, चेन्नई एक्सप्रेस, बोल बच्चन। आने वाली फिल्म दिलवाले में भी कुछ न कुछ तो ऐसा होगा ही।
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जेपी दत्ता ने भारतीय सैनिकों, सीमा पर रहने वालों और शरणार्थियों की जिंदगी को हमेशा से पूरी शिद्दत के साथ दिखाया है। बॉर्डर, एलओसी कार्गिल, रिफ्यूजी ऐसी ही कुछ फिल्में हैं।
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जोया अख्तर ज्यादातर जिंदगी को खुल कर जीने और अलग अलग जगह ट्रैवल करने पर फिल्में बनाती हैं। उनकी फिल्में जिंदगी न मिलेगी दोबारा, दिल धड़कने दो, बॉम्बे टॉकीज इसका बेहतरीन उदाहरण हैं।
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अनुराग बसु की फिल्मों पर गौर किया जाए तो यह समझ आता है कि उनकी फिल्में बड़े बड़े शहरों में रहने वाले साधारण लोगों की जिंदगी पर आधारित होती हैं। उनकी सच्चाई, कहानी, धोखाधड़ी यह सब अनुराग की फिल्मों में मिलता है। जैसे गैंग्सटर, लाइफ इन अ मेट्रो, बर्फी, मर्डर।
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जबकि अनुराग कश्यप की फिल्मों के लिए तो दो ही शब्द हैं- डार्क और इंटेन्स। छोटे बड़े शहरों की झकझोर देने वाली कहानियां मिलती हैं इनकी फिल्मों में। गैंग्स ऑफ वासेपुर, गुलाल, देव डी, ब्लैक फ्राइडे, बॉम्बे वेलवेट उनकी ऐसी ही कुछ फिल्में हैं।
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आशुतोष गोवारिकर ज्यादातर पीरियड फिल्में बनाते हैं यानि बीते समय पर आधारित कहानियां। जैसे जोधा अकबर, लगान, खेलें हम जी जान से और अब आने वाली फिल्म मोहनजो दारो।