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PICS: एमपी की बेटी और राजस्थान की इस रानी से डरती है भाजपा

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ललित मोदी से संबंधों को लेकर बेशक वसुंधरा राजे पूरी भाजपा की आंख की किरकिरी बनी हुई हों लेकिन पार्टी चाहकर भी उन्हें हटाने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। जानिए ताकतवर वसुंधरा की जिंदगी के कुछ खास अफसानें।
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ग्वालियर के राज घराने में महाराजा जिवाजी राव के यहां 1953 में जन्मीं वसुंधरा राजे दूसरी बार राजस्‍थान की मुख्यमंत्री बनीं हैं। उनके पिता ग्वालियर के 9वें महाराजा थे।
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वसुंधरा राजे की माता विजयाराजे सिंधिंया लंबे समय तक भाजपा की सांसद रहीं। उन्हें राजमाता भी कहा जाता था। मुंबई के सोफिया कालेज से बीए आनर्स करने वाली राजे कम उम्र में ही राजनीति में आ गईं थीं।

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साल 1972 में उनकी शादी राजस्‍थान के ढोलपुर के सातवें महाराजा हेमंत सिहं से हुई। खास बात ये रही कि वसुंधरा राजे जहां क्षत्रिय परिवार से आती थी वहीं उनकी शादी राजस्‍थान के जाट राजवंश में हुई।
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वसुंधरा राजे को जिंदगी में सबसे बड़ा धक्‍का तब लगा जब शादी के एक साल बाद ही उन्हें अपने पति से अलग होना पड़ा। राजे उस समय गर्भवती थी, इसके बाद उन्हें अपने ससुरालियों के खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। जिसमें उनकी मां विजयाराजे उनका सहारा बनीं। वसुंधरा ने जिंदगी का काफी सफर अकेले ही गुजारा।
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1973 में उन्होंने अपने बेटे दुष्यंत को जन्म दिया। फिलहाल दुष्यंत भी भाजपा से सांसद हैं। उन्हीं की कंपनी में ललित मोदी के निवेश को लेकर वसुंधरा राजे और दुष्यंत पर उंगली उठ रही हैं।
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पति से विवाद के बाद वसुंधरा को परिवार के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी। जिसके बाद उनके बेटे दुष्यंत को पिता हेमंत सिंह की शाही संपति में हिस्सा मिल सका। हेमंत के राज परिवार की राजस्‍थान के अलावा दिल्‍ली और शिमला में काफी संपति है। दिल्‍ली के ढोलपुर हाउस (जिसमें लोकसेवा आयोग का कार्यालय है) के अलावा दुष्यंत को पिता की अन्य संपति में भी हिस्सा लिया।

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वसुंधरा राजे ने अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरूआत भाजपा में युवा मोर्चे से की थी। जहां उन्हें भाजपा युवा मोर्चा का प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया।

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1984 में राजे ने ढोलपुर लोकसभा सीट से जीत दर्ज कर संसदीय राजनीति की शुरूआत की। खास बात ये थी कि जहां उनके भाई माधवराव सिंधिंया कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे वहीं राजे और उनकी मां की गिनती खांटी भाजपाइयों में होती थी।

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पांच बार सांसद और चार विधायक रही वसुंधरा राजे ने उस समय राजनीति में तहलका मचा दिया जब उन्होंने राजस्‍थान में पहली बार भाजपा सरकार बनाई और वो साल 2003 में राजस्‍थान की पहली महिला मुख्यमंत्री चुनी गईं।

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हालांकि अगले विधानसभा चुनावों में उन्हें कांग्रेस के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी। लेकिन साल 2013 में वसुंधरा फिर प्रचंड बहुमत के साथ वापस लौटी और सरकार बनाई।

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स्वभाव से अडि़यल माने जाने वाली राजे के भाजपा में रुतबे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राजस्‍थान में उनके मामलों में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और आरएसएस भी हस्तक्षेप नहीं करता।

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साल 2008 में विधानसभा चुनाव में हार के बाद वसुंधरा को नेता प्रतिपक्ष से हटाने का प्रयास किया गया। भाजपा नेतृत्व ने एक बार उन पर कार्रवाई भी कर दी लेकिन राजस्‍थान भाजपा के विधायकों ने राजे के समर्थन में पार्टी से बगावत कर दी। यह देख भाजपा नेतृत्व को अपने पांव वापस खींचने पड़े, जिसके बाद राजे को दोबारा नेता प्रतिपक्ष बनाया गया।
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ललित मोदी से संबंधों को लेकर लगातार वसुंधरा और उनके सांसद बेटे दुष्यंत पर उंगलियां उठ रही हैं, इससे पार्टी की छवि को भी धक्‍का लग रहा है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह चाहकर भी वसुंधरा के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। पार्टी को डर है कि अगर वसुंधरा पर कार्रवाई की गई तो पार्टी में दोफाड़ भी हो सकती है और काफी संख्या में विधायक वसुंधरा के समर्थन में जा सकते हैं।
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