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जानिए तलवार दंपति के वकीलों की वो 6 दलीलें, जिसने पलट कर रख दिया पूरा केस

Fri, 13 Oct 2017 11:24 AM IST
Team Digital
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आरुषि-हेमराज मर्डर मिस्ट्री - फोटो : SELF
आरुषि हेमराज हत्याकांड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरुषि के माता-पिता राजेश तलवार और नूपुर तलवार को बरी कर दिया। शुक्रवार को गाजियाबाद के डासना जेल से दोनों रिहा हो जाएंगे। 9 साल लंबे चले इस केस में हाईकोर्ट में अपील पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने निचली अदालत के फैसले की खामियों को बारीकी से उजागर किया।
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- फोटो : अमर उजाला
तलवार दंपति के वकीलों ने सीबीआई के सबूतों की खामियों को भी हाईकोर्ट में उजागर किया जिसका नतीजा रहा कि सीबीआई कोर्ट का फैसला हाईकोर्ट ने पलटते हुए तलवार दंपति को संदेह के लाभ में बरी कर दिया। अगली स्लाइड में जानिए, वो 6 दलीलें जिसने पूरा केस ही पलट कर रख दिया...
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1- दलील दी गई कि आरुषि के कमरे में हेमराज की मौजूदगी का कोई भौतिक या वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं मिला। कमरे में सिर्फ आरुषि के खून के धब्बे ही पाए गए। इससे सीबीआई की यह धारणा सही नहीं है कि आरुषि और हेमराज एक साथ थे।

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2- दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में तलवार के नौकरों कृष्णा, विजय मंडल और राजकुमार के सीबीआई को दिए बयानों को नजरअंदाज किया। सीबीआई ने हत्या में प्रयुक्त खुखरी कृष्णा की निशानदेही पर बरामद होने की बात कही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी डॉक्टरों ने खुखरी के इस्तेमाल की बात कही है। एम्स और सीएफएसएल के सात विशेषज्ञों की टीम ने भी खुखरी से हत्या की संभावना जताई है। इस रिपोर्ट को भी नजर अंदाज किया गया।
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3- दलील दी गई कि सीडीएफडी हैदराबाद की छह नवंबर 2008 की रिपोर्ट में हेमराज का डीएनए कृष्णा के तकिए के कवर पर बरामद हुआ जो उसी परिसर से बरामद किया गया जहां से खुखरी मिली थी। इस बात के पर्याप्त साक्ष्य मिले कि घटना में कृष्णा, विजय मंडल और राजकुमार का हाथ हो सकता है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने  इस परिकल्पना पर कि हत्या फ्लैट में मौजूद लोगों ने की है इन साक्ष्यों को नजरअंदाज किया।
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4- बचाव पक्ष के वकीलों ने कहा कि ट्रायल का यह निष्कर्ष सही नहीं है कि डॉ. राजेश तलवार और उनके भाई दिनेश ने हेमराज की लाश की पहचान से मना कर दिया था। बयान से साबित है कि उन्होंने हेमराज के शव को पहचाना था।
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5- कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने क्राइम सीन को वैज्ञानिक तरीके से फिर से सृजित करने के नतीजों में नजरअंदाज किया जिसमें पॉलीग्राफी, ब्रेन मैपिंग और मनोवैज्ञानिक जांच की गई। विशेषज्ञों ने 10 जून 2008 को जांच में यह साबित किया कि डॉ. तलवार के कमरे में आरुषि के कमरे में होने वाली आवाजों को नहीं सुना जा सकता था।
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6- दलील दी गई कि पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हैं। सुप्रीमकोर्ट ने अपने तमाम निर्णयों में कहा है कि अदालत को संभावनाओं पर निर्णय नहीं देना चाहिए तब तक कि साक्ष्य अंतिम और निर्विवाद रूप से प्रमाणित नहीं हो।
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