महेश्वर की साड़ी विश्व प्रसिद्ध है।
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देवी अहिल्या ने बुनकरों को बसाया था
यह संयोग नहीं, बल्कि महेश्वर की 300 वर्ष पुरानी बुनाई परंपरा के पुनर्जागरण का संकेत है। जिस नगरी में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ने बुनकरों को बसाकर महेश्वरी साड़ी की नींव रखी थी, उसी नगरी की बुनाई आज राष्ट्रपति भवन तक पहुंच चुकी है। करघों की हर आवाज आज मानो यह कह रही है कि परंपरा कभी पुरानी नहीं होती, यदि उसे समर्पण और गुणवत्ता के साथ आगे बढ़ाया जाए। महेश्वर की रंगाई, बुनाई केवल वस्त्र निर्माण नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और आत्मनिर्भरता की जीवंत पहचान है। यहां हजारों परिवार आज भी हस्तकरघा उद्योग से जुड़े हैं। बदलते समय में मशीनों की चुनौती के बावजूद महेश्वर के बुनकरों ने अपनी कला को जीवित रखा और उसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
महेश्वर की बुनाई देश की सांस्कृतिक पहचान
रूही हैंडलूम के संचालक कमल गौड़ का राष्ट्रीय पुरस्कार केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि हर उस बुनकर की मेहनत का सम्मान है जिसने वर्षों तक करघे पर बैठकर भारतीय परंपरा को जीवित रखा। वहीं, राष्ट्रपति भवन के स्वतंत्रता दिवस समारोह में महेश्वरी स्टोल का चयन यह प्रमाणित करता है कि महेश्वर की बुनाई आज भारत की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। यदि सरकार महेश्वरी बुनाई को आधुनिक डिजाइन, विपणन, निर्यात और युवा प्रशिक्षण से लगातार जोड़ती रही, तो आने वाले वर्षों में महेश्वर विश्व के प्रमुख हस्तकरघा केंद्रों में और मजबूत पहचान स्थापित कर सकता है। यह समय विरासत को संरक्षित करने का नहीं, बल्कि नई पीढ़ी तक गर्व के साथ पहुंचाने का भी है।
इनका कहना है...
- नरेंद्र पंड्या बुनकर, ताना-बाना (महेश्वर): राष्ट्रपति भवन के सम्मान समारोह में महेश्वरी स्टोल का शामिल होना हमारे लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। इससे देश-दुनिया में हमारी बुनाई की नई पहचान बनेगी और महिला बुनकरों का भी उत्साह बढ़ेगा।
- अनिल मुक्ति ज्योति हैंडलूम (महेश्वर): कमल गौड़ को राष्ट्रीय पुरस्कार हर उस परिवार की जीत है जो वर्षों से करघों के सहारे अपना जीवन चला रहा है। यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों को इस कला से जुड़े रहने की प्रेरणा देगा।"
- अर्जुन चौहान वीरा हैंडलूम (महेश्वर): महेश्वर की पहचान केवल पर्यटन नहीं, बल्कि उसकी बुनाई भी है। राष्ट्रपति भवन तक पहुंची हमारी कला यह साबित करती है कि परंपरा और गुणवत्ता का कोई विकल्प नहीं है।
- यशवंतराव होलकर रेवा सोसाइटी(महेश्वर): सरकार यदि महेश्वरी बुनाई के लिए डिजाइन, विपणन और निर्यात की बेहतर व्यवस्था विकसित करे तो यहां के हजारों बुनकरों की आर्थिक स्थिति और मजबूत होगी। यह सम्मान उसी दिशा में एक नई शुरुआत है।