सोमवार को निकलेगी बाबा महाकाल की सवारी।
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महाकाल की सवारी की परंपरा सदियों पुरानी है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। ग्यारहवीं शताब्दी के राजा भोज ने इस परंपरा को बड़े रूप में शुरू किया था। उन्होंने इस जुलूस में कई नए कलाकारों और संगीतकारों को शामिल किया। मुगल सम्राट अकबर और जहांगीर भी इस जुलूस में शामिल हुए थे। सिंधिया वंश के राजाओं ने इस जुलूस को और अधिक भव्य बनाया, जिसमें नए रथ और हाथी शामिल किए गए। महाकाल की सवारी एक भव्य यात्रा है, जिसमें विभिन्न कलाकार, संगीतकार और नर्तक शामिल होते हैं। भगवान महाकाल को एक पालकी में बैठाकर शहर में घुमाया जाता है। यह पालकी चांदी की बनी होती है और इसे कई प्रकार के फूलों से सजाया जाता है। लाखों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं और महाकाल के जयकारे लगाते हैं। महाकाल की एक झलक पाने के लिए भक्तों की भीड़ हफ्तों पहले से ही शुरू हो जाती है। जुलूस में भंडारी, नागा साधु, ढोल-नगाड़े वाले, तलवारबाज, घुड़सवार और अन्य कलाकार शामिल होते हैं।