धार्मिक नगरी उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे भूखी माता का बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर में दो देवियां विराजमान हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यह दोनों बहनें हैं। इनमें से एक को भूखी माता और दूसरी को भुवनेश्वरी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर को भुवनेश्वरी भूखी माता मंदिर भी कहा जाता है। कहा जाता है कि आज भी इस मंदिर में पशु बलि देने और शराब का भोग लगाने की प्रथा सदियों से चली आ रही है।
मंदिर की यह है पौराणिक कथा
मंदिर के पुजारी विजय चौहान ने बताया कि भूखी माता को प्रतिदिन एक युवक की बलि दी जाती थी। एक बार एक दुखी मां राजा विक्रमादित्य के पास गई। उसके बेटे की बलि चढ़ाई जानी थी। तब विक्रमादित्य ने माता से नरबलि नहीं लेने का आग्रह किया। यह भी कहा कि यदि देवी ने उनकी बात नहीं मानी तो वे खुद उनका आहार बनेंगे। वृद्धा के जाने के बाद विक्रमादित्य ने कई तरह के पकवान बनवाने का आदेश दिया। इन पकवानों से पूरे शहर को सजा दिया गया। एक तख्त पर मिठाइयों के साथ मिठाइयों से बना एक मानव पुतला लिटा दिया। विक्रमादित्य खुद उसके नीचे छिप गए। रात को सभी देवियों ने पकवानों का स्वाद लिया। जब जा रही थीं, तब एक देवी ने जानना चाहा कि आखिर तख्त पर क्या रखा है। देवी ने वहां रखे पुतले को खा लिया और देवी खुश हो गई। इतने में विक्रमादित्य आए और हाथ जोड़कर बताया कि उन्होंने ही इसे रखवाया है। देवी ने वरदान मांगने को कहा, तब विक्रमादित्य ने कहा कि कृपा कर आप नदी के उस पार विराजमान रहें। देवी ने कहा कि तुम्हारे वचन का पालन होगा। उस देवी का नाम भूखी माता रख दिया गया। इसके बाद विक्रमादित्य ने नदी के उस पार मंदिर बनवाया। इसके बाद देवी ने कभी नरबलि नहीं ली।
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