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Ram Navami: एक मंदिर ऐसा भी, जहां राजा के रूप में पूजे जाते हैं राम, 'बुंदेलखंड की अयोध्या' का खास रहा इतिहास

Fri, 27 Mar 2026 10:35 AM IST
टीकमगढ़ ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, निवाड़ी

सार

ओरछा में राम नवमी पर रामराजा मंदिर में भव्य जन्मोत्सव आयोजित हो रहा है। दोपहर 12 बजे पूजा, 51 हजार लड्डुओं का भोग लगाया जाएगा और शोभायात्रा निकाली जाएगी। महारानी कुंवरि गणेश से जुड़ी परंपरा आज भी श्रद्धा से निभाई जाती है।

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ओरछा के राजा राम मंदिर की आकर्षक सजावट की गई है। - फोटो : अमर उजाला
बुंदेलखंड की धार्मिक नगरी ओरछा में रामनवमी का पर्व इस वर्ष भी अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और ऐतिहासिक परंपराओं के साथ मनाया जा रहा है। यहां स्थित राम राजा मंदिर में दोपहर ठीक 12 बजे भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव का आयोजन होगा, जिसे देखने और उसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

ओरछा को “बुंदेलखंड की अयोध्या” कहा जाता है, और इसका कारण यहां की अद्वितीय परंपरा है, जो लगभग 500 वर्षों से चली आ रही है। इतिहास के अनुसार, ओरछा की महारानी कुंवर गणेश अयोध्या से भगवान श्रीराम के विग्रह को लेकर संतों के साथ पदयात्रा करते हुए नवमी के दिन ओरछा पहुंची थीं। उसी समय भगवान राम को यहां राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया, और तभी से उन्हें “राम राजा सरकार” के रूप में पूजा जाता है। यह परंपरा आज भी जीवंत है और देशभर में अपनी तरह की अनूठी मानी जाती है।

 
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ओरछा का राजा राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
क्या है राजा राम की पौराणिक कथा
ओरछा की प्रसिद्ध रामराजा परंपरा से जुड़ी यह कथा आस्था और भक्ति का अनूठा उदाहरण मानी जाती है। लोकमान्यताओं के अनुसार ओरछा के शासक मधुकर शाह भगवान कृष्ण के उपासक थे, जबकि उनकी महारानी कुंवरि गणेश प्रभु श्रीराम की अनन्य भक्त थीं। इसी कारण दोनों के बीच धार्मिक मतभेद भी सामने आते रहते थे। कहा जाता है कि एक बार मधुकर शाह ने रानी को वृंदावन चलने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने अयोध्या जाने की इच्छा जताई। इस पर राजा ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि उनके आराध्य राम वास्तव में हैं, तो उन्हें अयोध्या से ओरछा लेकर आएं।

 
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ओरछा का राजा राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
रानी कुंवरि गणेश अयोध्या पहुंचीं और वहां 21 दिनों तक कठोर तपस्या की, लेकिन प्रभु श्रीराम के दर्शन नहीं हुए। निराश होकर उन्होंने सरयू नदी में कूदने का संकल्प लिया। मान्यता है कि उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीराम स्वयं प्रकट हुए और उन्हें बाल रूप में दर्शन दिए। रानी के आग्रह पर जब वे ओरछा चलने को तैयार हुए, तो उन्होंने तीन शर्तें रखीं— पहली, जहां उन्हें स्थापित किया जाएगा, वहां से वे कभी नहीं हटेंगे। दूसरी, ओरछा में वे ही राजा के रूप में पूजे जाएंगे और कोई अन्य शासक उनसे ऊपर नहीं होगा। तीसरी, वे बाल स्वरूप में विशेष मुहूर्त में पैदल ही साधु-संतों के साथ ओरछा जाएंगे। रानी ने सभी शर्तें स्वीकार कर लीं और भगवान राम को अपने साथ ओरछा ले आईं। तभी से यहां राम ‘राजा’ के रूप में विराजमान हैं और रामराजा मंदिर में उनकी राजसी परंपरा आज भी निभाई जाती है। एक प्रचलित दोहे के अनुसार भगवान राम का विशेष संबंध अयोध्या और ओरछा दोनों से माना जाता है—दिन में वे ओरछा में विराजते हैं और रात्रि में अयोध्या में निवास करते हैं।

 
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ओरछा का राजा राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
51 हजार लड्डुओं का भोग 
रामनवमी के अवसर पर मंदिर परिसर को भव्य रूप से फूलों और आकर्षक सजावट से संवारा गया है। जन्मोत्सव के बाद विशेष मंगला आरती का आयोजन होगा। इस मौके पर 51 हजार लड्डुओं का भोग लगाया जाएगा, जबकि श्रद्धालुओं के लिए लगभग 25 क्विंटल देसी घी से बने लड्डुओं का प्रसाद भी वितरित किया जाएगा।
आज के दिन एक भव्य शोभायात्रा भी निकाली जाएगी, जिसमें भगवान राम राजा सरकार की झांकी विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगी। शोभायात्रा में महारानी कुंवर गणेश की गोद में विराजमान भगवान राम की झलक देखने को मिलेगी, जिसे श्रद्धालु अपने घरों के सामने तिलक कर आरती उतारकर स्वागत करेंगे। इस दौरान बधाई गीत, बुंदेली नृत्य और भक्ति कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाएगा।

ओरछा में आज भी भक्तों की पदयात्रा की परंपरा कायम है, जो इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। रामनवमी का यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को भी दर्शाता है।

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