ओंकारेश्वर में मोरारी बापू की कथा
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शंकराचार्य ने भारत को एकता के सूत्र में बांधा
मोरारी बापू ने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य ने बाल्यावस्था में ही ओंकारेश्वर की ज्ञानभूमि पर आकर तपस्यारत गोविंदपादाचार्य से दीक्षा प्राप्त की और संन्यास ग्रहण किया। उन्होंने यहां वेद-पुराणों का अध्ययन किया तथा नर्मदाष्टक सहित अनेक स्तोत्रों की रचना की। इसके बाद वे ओंकारेश्वर से महिष्मती नगरी पहुंचे, जिसे आज महेश्वर के नाम से जाना जाता है, जहां उन्होंने विद्वान मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ किया। बाद में मंडन मिश्र भी उनके साथ सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए निकल पड़े। आदि शंकराचार्य ने देशभर में भ्रमण कर चार पीठों की स्थापना की और भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकता को मजबूत करने का कार्य किया। एकात्म धाम परियोजना के प्रथम चरण में आचार्य शंकर की 108 फीट ऊंची बहुधातु प्रतिमा स्थापित की जा चुकी है। परियोजना के अगले चरण में लगभग 2400 करोड़ रुपये की लागत से ‘अद्वैत लोक’ संग्रहालय सहित विभिन्न कार्य प्रस्तावित हैं।
ॐ निराकार है, स्वस्तिक साकार है
अभय घाट पर आयोजित कथा एवं प्रवचन में मोरारी बापू ने ‘ॐ’ और स्वस्तिक के आध्यात्मिक महत्व पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि “ॐ निराकार है और स्वस्तिक साकार है, दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं।” उन्होंने नाद की विभिन्न अनुभूतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकृति में जल, वायु और स्पर्श सहित अनेक प्रकार के नाद निरंतर मौजूद हैं। नदियों और झरनों का कल-कल प्रवाह, समुद्र की ध्वनि, हवा का स्वर, वृक्षों के पत्तों की आवाज और किसी वस्तु के स्पर्श से उत्पन्न ध्वनि भी प्रकृति के नाद का हिस्सा हैं।
उन्होंने रामचरितमानस की चौपाइयों और शिव भक्ति के भजनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश दिया। ‘मंगल भवन अमंगल हारी’, ‘द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी’, ‘उमा सहित जेहि जपत पुरारी’ सहित राम-शिव से जुड़े भजनों और बारह ज्योतिर्लिंग के भजन पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे। बापू ने कहा कि भगवान शिव राम का नाम जपते हैं और राम शिव का स्मरण करते हैं। राम और शिव की यह परंपरा भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति की एकता का संदेश देती है।
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