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Pitru Paksha 2022: नर्मदा के इस तट पर आज भी राजा इंद्र करते हैं पिंडदान, तर्पण करने से मिलता है 16 गुना पुण्य

Sun, 11 Sep 2022 01:58 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर

सार

Pitru Paksha 2022: नर्मदा के इस तट पर आज भी राजा इंद्र करते हैं पिंडदान, तर्पण करने से मिलता है 16 गुना पुण्य
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नर्मदा नदी का त्रिशूलभेद, जहां राजा इंद्र ने किया था तर्पण - फोटो : सोशल मीडिया
नर्मदा नदी देश की पवित्र नदियों में से एक है। इस नदी का धार्मिक और पौराणिक महत्व है। तीज त्यौहारों से लेकर अमावस्या और पूर्णिमा के मौके पर यहां बड़ी संख्या में लोग स्नान करने पहुंचे हैं। पितृ पक्ष में नर्मदा नदी में पिंडदान का बेहद खास महत्व है। कहा जाता है कि नर्मदा के तट पर ब्रह्मांड का सबसे पहला पिंडदान स्वयं पितरों ने किया था। नर्मदा नदी के बारे में एक मान्यता राजा इंद्र से जुड़ी भी है। कहा जाता है कि रेवा के तट पर आज भी स्वयं राजा इंद्र पितृ-पक्ष के दौरान यहां पिंडदान करने आते हैं और अदृश्य रूप से अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं।

हिन्दू धर्म में 16 दिन श्राद्ध पक्ष के बताएं गए हैं। इस दौरान देश भर में कई ऐतिहासिक स्थल हैं, जहां लोग अपने पूर्वजों की आत्म शांति और उनके मोक्ष के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करने के लिए पहुंचते हैं। मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के कई प्रसिद्ध घाट हैं, जहां लोग पितृ-पक्ष के दौरान अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं। आज हम आपको नर्मदा के एक ऐसे ही घाट के बारे में विस्तार से बताते हैं।
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त्रिशूलभेद में पितृपक्ष में बड़ी संख्या में लोग तर्पण करने पहुंचते हैं। - फोटो : सोशल मीडिया
त्रिशूलभेद तीर्थ 
जबलपुर शहर से करीब 15 किमी दूर नर्मदा के दक्षिणी तट को त्रिशूलभेद तीर्थ के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि यहीं भगवान शिव ने अपने त्रिशूल का निर्माण किया था। पितृ-पक्ष में यहां बड़ी संख्या में लोग अपने पूर्वजों की आत्म शांति के लिए पिंडदान करने आते हैं। कहा जाता है कि आज भी स्वयं राजा इंद्र यहां अपने पूर्वजों का अदृश्य रूप से श्राद्ध कर्म करने के लिए पहुंचते हैं। पिंडदान के लिए इस जगह को बिहार के गया जी से भी ज्यादा पवित्र बताया गया है। कहा जाता है कि नर्मदा के त्रिशूलभेद तीर्थ पर श्राद्ध कर्म करने वाले व्यक्ति को गया जी की फल्गू नदी में पिंडदान से 16 गुना ज्यादा पुण्य फल की प्राप्ति होती है। नर्मदा के त्रिपुरी तीर्थ त्रिशूलभेद में अयोध्या के राजा मनु ने भी अपने पितरों का तर्पण किया था। स्कंद पुराण के रेवाखंड के अनुसार राजा हिरण्यतेजा एवं राजा पुरूरवा ने भी नर्मदा तट पर आकर अपने पितरों का तर्पण और यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठान किए थे। 
 
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कहा जाता है भगवान शिव ने यहीं अपने त्रिशूल का निर्माण किया था। - फोटो : सोशल मीडिया
स्कंद पुराण में मिलता है उल्लेख 
नर्मदा नदी में श्राद्ध करने के महत्व का उल्लेख स्कंद पुराण के रेवा खंड में भी वर्णित है। इसमें राजा इंद्र के नर्मदा नदी के लम्हेटाघाट के पास त्रिशूलभेद में पूर्वजों का पिंडदान करने का जिक्र भी मिलता है। स्कंद पुराण के रेवाखंड श्राद्ध की महत्ता और आवश्यकता को भी बताया गया है। रेवा खंड के अनुसार प्राचीनकाल में ऋषि, मुनि, देवता और दानवों को श्राद्ध कर्म की जानकारी नहीं थी, जिसके चलते मृत्यु के बाद उनकी आत्माएं पृथ्वी पर भटक रही थीं, जब सतयुग के प्रारंभ में धरती पर नर्मदा नदी प्रकट हुईं तो पितरों ने स्वयं नर्मदा के तट पर अपनी मुक्ति के लिए ब्रह्मांड का पहला श्राद्ध किया था।
 
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