इंदौर एमबीए छात्रा हत्याकांड
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छात्रा का वॉट्सएप हैक कर रखा था
पूछताछ में पता चला है कि आरोपी पीयूष पूरी तरह से युवती पर नियंत्रण चाहता था। उसने उसका वॉट्सएप भी हैक कर रखा था और बार-बार चैटिंग भी पढ़ता था। उसके इस व्यवहार के कारण छात्रा दूसरे चैटिंग ऐप इस्तेमाल करती थी। जिस दिन आरोपी ने उसकी हत्या की, उस दिन दूसरे ऐप पर युवकों की चैटिंग विवाद की वजह बनी। ये भी पता चला कि पीयूष युवती के प्रति अधिक भावनात्मक हो गया था और उस पर शंका करने लगा था। वह दूसरों से बात न करने और उसकी बात सुनने का अक्सर दबाव बनाता था। उसका यह व्यवहार कई बार छात्रा को परेशान भी करता था और अक्सर इसे लेकर दोनों में विवाद भी होते थे। हमने जब इस केस को लेकर मनोवैज्ञानिकों से बात की, तो उनका भी यही कहना था कि अक्सर जिन लोगों में आत्मविश्वास की कमी होती है, वे अपने पार्टनर पर हावी होने की कोशिश करते हैं और क्षणिक आवेश में वे किसी भी हद तक कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। पीयूष की मानसिक स्थिति भी ऐसी ही थी। वह युवती पर नियंत्रण और एकाधिकार चाहता था। वह खुद को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहा था। उसे डर था कि वह अपने पार्टनर को खो देगा।
एक माह पहले पिता से कराई थी छात्रा की बात
आरोपी के पिता को 9 जनवरी को उसके मोबाइल का एक फोटो देख शंका हुई थी। छात्रा पीयूष के काफी करीब खड़ी थी। इसके बाद पिता ने छात्रा से बात करने की इच्छा जताई थी। पिता ने छात्रा से दूरी बनाने के लिए कहा था और यह भी बोला था कि अभी दोनों के पढ़ने का समय है। पीयूष ने पिता से शादी की बात भी की थी, लेकिन पिता ने कहा था कि पहले तुम्हारी बड़ी बहन की शादी करनी है, इसके बाद तुम्हारी शादी के बारे में सोचेंगे। इस घटना के बाद आरोपी पीयूष से उसके परिजनों ने नाता तोड़ लिया है। पिता बोले कि उनके बेटे ने किसी परिवार की बेटी की जान ली है, हमारे लिए वह मर चुका है। यह केस फास्टट्रैक कोर्ट में चले और पीयूष को फांसी होनी चाहिए। हमने उसे इंदौर भेजा था ताकि वह पढ़-लिखकर अच्छा बने, लेकिन हमें नहीं पता था कि वह दरिंदा बन जाएगा।
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दिमाग बन गया था दुश्मन
मनोरोग विशेषज्ञ मनीष जैन के अनुसार इस केस की परिस्थितियों को देखकर लगता है कि आरोपी पैरानोइया सिंड्रोम से ग्रस्त था। इसमें रोगी दूसरों के प्रति तीव्र और तर्कहीन अविश्वास या संदेह करता है और खुद को भी सामने वाले से खतरा महसूस करता है। दिमाग ही रोगी का दुश्मन बन जाता है। इस अवस्था में अंतर्दृष्टि खो जाती है। कोई भी तर्क या सबूत रोगी को यह विश्वास दिलाने में सक्षम नहीं होता कि वह जो सोच रहा है वह गलत है। लोग मेरे खिलाफ हैं वाली भावना उनकी वास्तविकता का मुख्य हिस्सा बन जाती है।