स्वच्छता में नंबर वन इंदौर ने लोकसभा चुनाव परिणाम में भी तिहरा रिकॉर्ड बनाया है। चुनाव के दौरान देशभर में चर्चा का केंद्र रहा इंदौर परिणाम आने के बाद भी छाया रहा। यहां नोटा ने रिकॉर्ड बनाया, शंकर लालवानी के नाम भी दो कीर्तिमान रहे।
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इंदौर में लोकसभा चुूनाव परिणाम में तीन रिकॉर्ड बने हैं।
- फोटो : अमर उजाला
लोकसभा चुनाव में इंदौर इस बार सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। पहले कांग्रेस प्रत्याशी अक्षय कांति बम के नामांकन वापस लेने की वजह से और फिर परिणाम के बाद तीन नए रिकॉर्ड बनाने की वजह से। परिणामों में इंदौर ने सबसे ज्यादा नोटा और सबसे बड़ी जीत का रिकॉर्ड बनाया है। तो वहीं किसी भाजपा प्रत्याशी को 12 लाख वोट मिलने का कीर्तिमान भी रचा गया। नोटा को 218674 वोट मिले हैं और भाजपा के प्रत्याशी शंकर लालवानी 1226751 वोटों के साथ 1175092 वोट के अंतर से जीते हैं।
पहले किसके नाम थे ये रिकॉर्ड
1. सांसद शंकर लालवानी ने देश में सबसे बड़ी जीत हासिल कर ली है। जीत का अंतर 1175092 है। इससे पहले, 2019 में सबसे बड़ी जीत गुजरात की नवसारी सीट के नाम पर थी। वहां भाजपा के सीआर पाटिल नवसार सीट से 6.90 लाख वोटों से जीते थे।
2. नोटा को पहली बार देश में 2,18,674 ज्यादा वोट मिल गए हैं। अब तक देश में रिकॉर्ड बिहार की गोपालगंज सीट के नाम पर था। उसे 2019 में देश में सबसे ज्यादा 51,600 वोट मिले थे।
3. प्रदेश में किसी भाजपा नेता को सर्वाधिक वोट मिले हैं। शंकर लालवानी संभतया पहले ऐसे सांसद बन गए, जिन्हें 12 लाख से ज्यादा वोट मिले हैं।
कांग्रेस ने की थी नोटा को वोट करने की अपील
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने जनता से अपील की थी कि नोटा को वोट करें। अक्षय कांति बम के नामांकन वापस लेने के बाद में कांग्रेस ने नोटा के प्रचार में अभियान भी चलाया था।
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- फोटो : अमर उजाला, डिजिटल, इंदौर
लालवानी ने कहा कांग्रेस ने दुष्प्रचार किया
परिणाम आने के बाद शंकर लालवानी ने कहा कि कांग्रेस ने दुष्प्रचार किया जिसकी वजह से नोटा को इतने अधिक वोट मिले। कांग्रेस ने जिस तरह से चुनाव के दौरान लोगों से नोटा को वोट देने की अपील की उससे गलत संदेश गया।
इंजीनियरिंग के बाद राजनीति में गए थे लालवानी
शंकर लालवानी को उनके मिलनसार व्यक्तित्व के लिए पहचाना जाता है। वे विवादों से दूर रहना पसंद करते हैं और भाजपा के अधिकांश वरिष्ठ नेता उन्हें पसंद करते हैं। वे भाजपा की गुटबाजी से भी दूरी बनाकर रखते हैं। शंकर लालवानी का जन्म 16 अक्टूबर 1961 को इंदौर में हुआ था। उनके पिता जमनादास लालवानी अखंड भारत के विभाजन से पहले इंदौर आए थे। जमनादास लालवानी इंदौर आकर भी आरएसएस में सक्रिय थे। वे जनसंघ पार्टी में थे और सामाजिक कामों में सक्रिय रहते थे। वे कई वर्षों तक मध्य प्रदेश में सराफा एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। शंकर लालवानी की माताजी गोरी देवी लालवानी एक गृहिणी थीं। शंकर लालवानी ने मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास की, फिर मुंबई से बी-टेक की पढ़ाई की फिर इंदौर आकर व्यापार और कंसल्टेंसी में लग गए।
पार्षद से शुरुआत की और पिछले सांसद चुनाव में पांच लाख वोट से जीते थे
1994 से 1999 तक वे इंदौर नगर निगम में पार्षद रहे। इसके बाद 1999 से 2004 तक वे 5 वर्ष तक इंदौर नगर निगम के सभापति पद पर रहे। 2013 में इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष बनाए गए। 2019 में जब भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें लोकसभा का टिकट दिया तो भारतीय जनता पार्टी करीब 5 लाख 47 हजार वोटों के ऐतिहासिक अंतर से अपने निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस पार्टी से जीत हासिल की। सांसद बनने के बाद, वह लोकसभा में आवास और शहरी मामलों की स्थायी समिति, सदन की बैठक से सदस्यों की अनुपस्थिति संबंधी समिति, संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय की सलाहकार समिति, सहकारिता विभाग सलाहकार समिति, उपभोक्ता मामले खाद्य और सार्वजनिक वितरण परामर्श समिति एवं एमएसएमई नेशनल बोर्ड के भी सदस्य हैं।
सिंधी राज्य की मांग से मुकरे
सांसद बनने के बाद शंकर लालवानी ने लोकसभा में सिंधी भाषा में अपनी बात रखते हुए सिंधी कला बोर्ड, सिंधी टीवी चैनल और अलग सिंधी प्रदेश की मांग पर सरकार को विचार करने के लिए कहा था। उनकी इस मांग के बाद देश में बड़ा बवाल मचा था। बाद में उन्होंने कहा कि मैंने उसी दिन स्पष्ट कर दिया था और बताया था कि मैंने कभी अलग सिंधी राज्य की मांग नहीं की। उसी दिन मैंने खंडन भी कर दिया था। उनकी इस मांग पर उन्हीं के समाज के लोग नाराज हो गए थे।