धार जिले के आदिवासी अंचलों में होलिका दहन के दूसरे दिन गल बाबा का मेला लगाया जाता है। इस दिन परंपरानुसार लोग रंग न खेलकर गल बाबा की पूजा करने जुटते हैं। लोगों को कई फीट ऊंचाई पर बांधकर लटकाया जाता है, फिर घुमाया जाता है। यह परंपरा काफी पुरानी बताई जाती है।
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धार के आदिवासी अंचल में गल पर घूमने की परंपरा है।
- फोटो : अमर उजाला
धार जिले के आदिवासी अंचलों में होलिका दहन के दूसरे दिन गल बाबा का मेला लगाया जाता है। इस दिन परंपरानुसार लोग रंग न खेलकर गल बाबा की पूजा करने जुटते हैं। लोगों को कई फीट ऊंचाई पर बांधकर लटकाया जाता है, फिर घुमाया जाता है। यह परंपरा काफी पुरानी बताई जाती है।
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हैं। तिरला के गल मेले में मन्नत धारी विशेष ड्रेस कोड में पहुंचे हैं।
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बता दें कि आदिवासी अंचल में हर 10-15 किमी में ऐसे मेले लगाए जाते हैं। इसका आयोजन ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता है। एक विशेष पहनावा यहां आने वालों का रहता है। बताते हैं कि मन्नतधारी ही गल पर घूमते हैं। होलिका दहन के दूसरे दिन ये मेले लगते हैं। गल पुरुष ही घूमते हैं। मन्नत अनुसार 1 साल, 5 साल गल घूमा जाता है।
मन्नत धारी अपने पूरे परिवार के साथ गल बाबा के मेले में पहुंचते हैं और मन्नत उतारते हैं। तिरला के गल मेले में मन्नत धारी विशेष ड्रेस कोड में पहुंचे हैं। लाइन लगी है। मन्नत धारी पुरुष की गल घूमने के लिए बकायदा पंचायत द्वारा इसकी रसीद काटी जाती है। मान्यता है कि बच्चा बीमार होने पर ठीक हो जाता है। बच्चा नहीं होने पर हो जाता है। घर में अन्य समस्याएं हैं तो मन्नत लेने पर मन्नत पूरी होती हैं तो गल घूमना होता है।
आदिवासी अंचल में हर 10-15 किमी में ऐसे मेले लगाए जाते हैं। इसका आयोजन ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता है।
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बता दें कि तिरला में एक ऊंचा टावर बनाया गया है, जिसकी ऊंचाई तकरीबन 50 फीट होती है। इस टावर पर एक व्यक्ति बैठा होता है और एक आड़ा बांस बंधा होता है, जिस पर मन्नत धारी व्यक्ति को कपड़े से बांध दिया जाता है और फिर नीचे से एक व्यक्ति रस्सी से उस बांस को गोल-गोल घुमाता है। इस तरह वह व्यक्ति ऊंचाई पर घूमता है। मन्नत धारी लोग मेले में एक निश्चित लाल कलर का कुर्ता और पीली पगड़ी पहनकर आते हैं। लोगों की मान्यता है कि गल बाबा की कृपा से वह जो मन्नत लेते हैं, वह पूरी हो जाती है।