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Holi 2022: मध्य प्रदेश में कहीं फगुआ गाकर तो कहीं गेर निकालकर खेली जाती है होली

Fri, 18 Mar 2022 11:05 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

होली का त्योहार देश के कोने-कोने में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन बच्चे, बूढ़े और जवान हर कोई रंगों की मस्ती में डूबा नजर आता है। देश के दिल मध्य प्रदेश में होली साधारण कैसे रह सकती है। अलग-अलग परंपरा के रंग इसे विशेष बनाते हैं। जानते हैं कहां-कैसे मनेगी होली। 
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मध्य प्रदेश में होली के रंग (फाइल फोटो)। - फोटो : सोशल मीडिया
होली का त्योहार देश के कोने-कोने में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन बच्चे, बूढ़े और जवान हर कोई रंगों की मस्ती में डूबा नजर आता है। ऐसे में देश के दिल मध्य प्रदेश में होली साधारण कैसे हो सकती है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में होली भी बेहद अनोखे अंदाज में मनाई जाती है। आइए आपको बताते हैं महाकाल धाम से लेकर राम राजा दरबार तक कैसे खेली जाती है होली

बाबा महाकाल की नगरी में होली
बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में हर त्योहार की अपनी ही एक अलग रौनक नजर आती है। रंगोत्सव भी यहां  बेहद खास तरीके से मनाया जाता है। मध्य प्रदेश ही नहीं देश में भी सबसे पहले होली बाबा महाकाल ही खेलते हैं। जहां पूरे देश में होलिका दहन देर रात में होता है, तो वहीं, महाकाल मंदिर में गोधुलि बेला में होलिका दहन के साथ ही रंगोत्सव की शुरुआत हो जाती है। होलिका दहन से पहले भी बाबा महाकाल को रंग गुलाल लगाया जाता है। मंदिर परिसर में पुजारी और भक्त जमकर रंग अबीर खेलते हैं। धुलेंडी के दिन सुबह 4 बजे भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल को रंग-गुलाल अबीर लगाकर उज्जैन में रंगों के पर्व का शुभारंभ होता है। इस अवसर पर बाबा महाकाल का टेसू के फूलों से विशेष शृंगार किया जाता है। होली के अलावा रंग पंचमी पर भी बाबा महाकाल को रंग लगाया जाता है। मथुरा-वृंदावन की तरह ही महाकाल धाम में भी होली की रौनक देखने लायक होती है, जिसके चलते बड़ी संख्या में शिव भक्त हर साल इस त्योहार का हिस्सा बनने के लिए दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं। 
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महाकाल धाम में होली (फाइल फोटो)। - फोटो : सोशल मीडिया
ओरछा में राम राजा दरबार की होली
धार्मिक नगरी ओरछा के रामराजा मंदिर में हर साल राजशाही परंपरा के साथ होली का पर्व मनाया जाता है। यहां राम राजा सरकार भक्तों के साथ चांदी की पिचकारी से होली खेलते हैं। ओरछा में आज भी प्राचीन परंपरा के अनुसार सबसे पहले मंदिर परिसर में होलिका दहन किया जाता है। इसके बाद शहर के दूसरे हिस्सों में होलिका दहन होता है। दूसरे दिन सुबह मंगला आरती के साथ ही धुलेंडी पर्व की शुरुआत होती है। भक्तों के साथ होली खेलने के लिए रामराजा सरकार गर्भगृह से निकलकर चौक में विराजमान होते हैं। वहीं इस मौके पर बुंदेलखंड से बड़ी संख्या में श्रद्धालु ओरछा पहुंचते हैं। मंदिर के आंगन में बड़ी-बड़ी पीतल की नांदों में रंग भरा जाता है और भगवान राम पर रंग बरसाकर होली की शुरुआत होती है। ओरछा में पूर्णिमा की रात से शुरू हुआ होली का पर्व रंगपंचमी तक जारी रहता है।
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ओरछा में राजाराम चांदी की पिचकारी से खेलते हैं होली। - फोटो : अमर उजाला
राजवाड़े की होलकर कालीन होली 
इंदौर में आज भी करीब 294 साल पुरानी होलकर कालीन परंपरा के अनुसार होली का पर्व मनाया जाता है। प्राचीन परंपरा है कि सबसे पहले होलिका दहन राजवाड़े में किया जाता है, जिसमें शहरभर के होलिका दहन उत्सव समिति के सदस्य शामिल होते हैं। वे यहां से होलिका दहन की अग्नि लेकर जाते हैं और घर, गली, चौराहे और मोहल्ले में इसी अग्नि से होलिका दहन करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस सरकारी होली की अग्नि से दहन करने से होलिका पूजन-दहन में शामिल होने वाले लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

होलकर कालीन होलिका दहन की परंपरा सूबेदार मल्हारराव होलकर ने 1728 में शुरू की थी। उनके शासन काल में राजवाड़े में खास तरह से होली का पर्व मनाया जाता था। होली के पर्व के लिए राजवाड़े को गुलाब जल से धोया जाता था और होली का पर्व पांच दिनों तक चलता था। उस दौर में होलकर आश्रित भालेकरी समाज के लोग लकड़ी, तुअर की संटी, गोबर के कंडों और घास-फूस से होलिका सजाते थे। पंचरंगी नाड़े व सफेद सूतों से लकड़ियों को बांधा जाता था। इसके बाद उसे साड़ियों से सजा कर गोबर से बने छोटे चल्लों की माला पहनाई जाती थी। हालांकि यहां धुलेंडी से ज्यादा रंगपंचमी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था।

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इंदौर के राजवाड़े में सबसे पहले होता है होलिका दहन (फाइल फोटो)। - फोटो : सोशल मीडिया
इंदौर की रंगपंचमी और प्रसिद्ध गेर
इंदौर के लोग होली का साल भर बेसब्री से इंतजार करते हैं। यहां परंपरागत होली-धुलेंडी और रंगारंग गेर के लिए कई दिनों पहले से ही तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। लोग धुलेंडी पर तो जमकर रंग खेलते ही हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा रंगपंचमी पर रंगों की बौछार की जाती है। रंगपंचमी के मौके पर इंदौर में गेर निकालने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है। गेर में मिसाइलें, पिचकारी, वॉटर टैंकर से 100 से 150 फीट ऊंचाई तक रंगों की बौछार की जाती है। 

इंदौर की गेर काफी प्राचीन और प्रसिद्ध है। इसे लेकर कहा जाता है कि होलकर वंश के लोग रंगपंचमी के अवसर पर नगरवासियों के संग होली खेलने के लिए बैलगाड़ियों में फूलों और प्राकृतिक चीजों से बने रंगों को लेकर निकलते थे। इस दौरान जो भी रास्ते में दिखता था उसे प्यार से रंग लगा दिया जाता था। लोग पिचकारियों से उन पर रंग डालते थे। 
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इंदौर में धूमधाम से मनाई जाती है रंगपंचमी (फाइल फोटो)। - फोटो : सोशल मीडिया
विंध्य की होली 
मध्य प्रदेश के रीवा जिले में होली का एक अलग अंदाज देखने को मिलता है। यहां होली के मौके पर हर तरफ बस ''जोगीरा सा रारारा'' की धुन के बीच मस्तों की टोली नगर में रंग अबीर लेकर घूमती रहती है। वहीं, जिले के ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक फाग गीत यानि की फगुआ गाया जाता है। विंध्य में बसंत पंचमी के बाद से ही फगुआ गाने की शुरुआत हो जाती है और ये सिलसिला होली तक जारी रहता है। लोग गांव में चौपालें लगाकर ढोल,मंजीरे और अन्य साजों के साथ फागुआ गाते दिख जाते हैं। बच्चे हों या बूढ़े सभी रंग-अबीर में सराबोर नजर आते हैं। रंगों की महफिल सजती है और जमकर होली खेली जाती है। कहते हैं विंध्य में फगुआ के बिना होली अधूरी मानी जाती है, यही वजह है कि यह परंपरा सालों से अनवरत जारी है। 

विंध्य की होली की एक खास बात ये भी है कि यहां होली के मौके पर कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं। लगभग हर घर में कढ़ी, इंदरहर, दाल बाटी, चोखा, अबाबट की चटनी, रसाज, गुराम, रिकमज जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं। साथ ही विशेष पकवान के रूप में गुजिया बनाई जाती है। जब फगुहार टोली घर में पहुंचती है तो गुजिया से उनका स्वागत करने की परंपरा है। वहीं, जाते समय उन्हें पान-सुपारी और इलायची खिलाने की प्रथा है। इस प्रथा को विंध्य क्षेत्र में व्यवहार के नाम से जाना जाता है।
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विंध्य में फगुआ गाकर खेली जाती है होली (फाइल फोटो)। - फोटो : सोशल मीडिया
नर्मदापुरम में यादव और कीर समाज की होली
मध्य प्रदेश के हर अंचल में होली के अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं। होशंगाबाद में कीर और यादव समाज बेहद खास अंदाज में होली मनाता है। यहां बृज की तरह होली मनाने की सदियों पुरानी परंपरा है। यादव समाज के लोग रंग-गुलाल उड़ाकर घर-घर जाकर राई नृत्य करते हैं और होली मनाते हैं। वहीं, नर्मदा किनारे बसे कीर-केवट लोग बड़े-बुजुर्गों द्वारा कायम परंपरा के अनुसार गांवों में लोकगीत गाकर फाग खेलते हैं। यहां के लोग रासायनिक रंगों की जगह फूलों से बने रंगों से होली खेलते हैं। 
 
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