मां अहिल्या शिव की परम भक्त थीं।
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आज भी पार्थिव शिवलिंग की अर्चना, जो मां साहेब के समय से चली आ रही है, पूरी श्रद्धा से होती है। वहां किसी विशेष वीआईपी पास की आवश्यकता नहीं होती, राजा हो या रंक, हर कोई पूजा कर सकता है। यह मां साहेब के द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक श्रद्धा की परंपरा है, जो जन-समानता का सर्वोच्च उदाहरण है। प्रकृति से प्रेम उनका सहज गुण था। 5 से 11 बिलपत्रों वाला बेलवृक्ष आज भी उनकी गद्दी पर स्थापित है, और श्रद्धालुओं को उनके अनुशासित, समर्पित जीवन की स्मृति कराता है।
तो ऐसे में, जब कोई पूछता है कि क्या कोई स्त्री इतनी अनुशासित और तटस्थ जीवन जी सकती है, तो महेश्वर की माताएं, महिलाएं आज भी उसका जीवंत प्रमाण हैं। वहां की महिलाएं आज भी सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान, पूजन, देव अर्पण, सेवा और गृहकार्य के साथ-साथ सामाजिक कर्तव्यों का पालन करती हैं, बिना किसी शंका, बिना किसी शिकायत। जब मैं अपनी मां को देखता हूं, उनके अनुशासित जीवन और दैनिक दिनचर्या को देखता हूं, तो सहज ही अनुमान होता है कि मां अहिल्या कितनी संतुलित, संयमित और समर्पित रही होंगी। यह जीवन तभी संभव है जब भीतर श्रद्धा हो, सेवा हो और समर्पण का भाव हो।