सिखों की दिवाली का ग्वालियर से नाता
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काजी की बात को सुनकर जहांगीर ने गुरु हरगोविंद साहिब को छोड़ने का आदेश जारी किया, लेकिन गुरु हरगोविंद साहिब ने अकेले रिहा होने से इंकार कर दिया। गुरु हरगोविंद साहिब जी ने अपने साथ सभी 52 हिंदू राजाओं को भी रिहा कराने की शर्त रखी। शर्त को स्वीकार करते हुए जहांगीर ने भी एक अनोखी शर्त रख दी, उसकी शर्त थी कि किले से गुरु जी के साथ सिर्फ वही राजा बाहर जा सकेंगे, जो सीधे गुरुजी का कोई अंग या कपड़ा पकड़े हुए होंगे। जहांगीर सोच रहा था कि एक साथ सभी राजा गुरु जी को छू नहीं पाएंगे और इस तरह बहुत से राजा इस किले में कैद ही रहेंगे।
जहांगीर की चालाकी को गुरु हरगोविंद साहिब पूरी तरह समझ चुके थे, उन्होंने मुस्कुराते हुए जहांगीर की इस शर्त को मान लिया। उसके बाद गुरु हरगोविंद साहिब ने एक विशेष कुर्ता सिलवाया, जिसमें 52 कलियां बनी हुई थी। इस तरह एक-एक कली को पकड़े हुए सभी 52 राजा किले से आजाद हो गए। 52 राजाओं को इस दाताबंदी छोड़ से एक साथ छुड़वाया गया था, इसलिए इस गुरुद्वारे को दाता बंदी छोड़ भी कहा जाता है। जहां लाखों की तादात में सिख धर्म के अनुयायी अरदास करने के लिए पहुंचते हैं। यहां पर देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्वभर से सिख धर्म के लोग छठवे गुरु हरगोविंद साहिब के गुरुद्वारे में मत्था टेकने के लिए आते हैं।