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Gandhi Jayanti: मैहर के गांधीवादी गांव से विलुप्त हो रहा बापू का चरखा, सुलखमा में विरासत बचाने की चुनौती

Wed, 02 Oct 2024 03:58 PM IST
अरविंद कुमार न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, मैहर

सार

Gandhi Jayanti: मैहर के गांधीवादी गांव से विलुप्त हो रहा बापू का चरखा, सुलखमा में विरासत बचाने की चुनौती
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बापू की विरासत - फोटो : अमर उजाला
मध्यप्रदेश के मैहर जिले के सुलखमा गांव को गांधीवादी गांव के नाम से जाना जाता है। यहां रहने वाले पाल समाज के लोग आज भी महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर ही चल रहे हैं।
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चरखा चलाने वाले बुजुर्ग - फोटो : अमर उजाला

गांव के कुछ बुजुर्ग लोग आज भी चरखा चलाकर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। लेकिन वक्त गुजरने के साथ चरखे की रफ्तार कमजोर पड़ने लगी। आज हाल यह है कि करीब 100 घरों में चलने वाले पाल समाज के चरखे बंद पड़े हैं और जो चल रहे हैं, वह भी अंतिम सांस ले रहे हैं। धीरे-धीरे विलुप्त के कगार पर हैं।

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चरखा - फोटो : अमर उजाला

दरअसल, खादी वस्त्र निर्माण के कारण लोगों को विरासत में पाल समाज को धंधा मिला। लेकिन अब उपेक्षित हो रहे हैं। नतीजा लोग इस धंधे को छोड़कर दूसरे कार्य करने को मजबूर हैं। ऐसी स्थिति में पाल समाज को दो वक्त की रोटी मिलना मुश्किल हो गया है। महात्मा गांधी के सपने को पूरा करने का दारोमदार जिन कंधों पर था, उन पाल समाज को दो वक्त की रोटी भी बमुश्किल ही नसीब हो रही है।

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खंडहर भवन - फोटो : अमर उजाला

बापू का चरखा आज देश के संग्रहालयों की धरोहर बन गया है। लेकिन सुलखमा गांव में दो जून की रोटी के लिए ही सही मगर पाल समाज आज भी महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन की ज्योति जलाए हुए हैं, वो भी बिना किसी सरकारी मदद के। लेकिन आज के इस आधुनिक दौर में चरखे के दम पर इनका गुजारा मुश्किल से हो रहा है। लेकिन बुजुर्गों की परंपरा पर आधारित यह रोजगार अब दम तोड़ता हुआ नजर आ रहा है। कारण यही है कि चरखे से सूत काटने के बाद भी यहां के लोगों को पूरी मजदूरी तक नहीं मिल पाती।

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चरखा चलाती महिला - फोटो : अमर उजाला

प्रशासन की ओर से इस कुटीर उद्योग को किसी प्रकार की मदद व प्रोत्साहन न मिलने से 100 साल से इस कारोबार से जुड़ा पाल परिवार निराश है। 70 साल से चरखा चलाकर सूत कात रहे दद्दू पाल ने बताया कि अब प्लास्टिक की चटाई के दौर में चरखे के सूत से बने कम्बल खरीदने में लोगों की रुचि नहीं रही। इसलिए अब इतनी आय नहीं हो पाती कि परिवार चल सके। फिर भी जब तक जिंदा हैं, हमारे घर में बापू का चरखा थमने वाला नहीं है।

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चरखे में काता जाने वाला सूत - फोटो : अमर उजाला

पाल समाज के लोगों ने बताया कि एक कंबल को बनाने में एक सप्ताह का समय लगता है और इस एक कंबल की कीमत करीब 800 से 900 रुपये मिलती है। लिहाजा, इतने से पैसे से जीवन का गुजारा कैसे होगा। बावजूद इसके ग्रामीण अपनी समस्याओं को दरकिनार करते हुए गर्व के साथ इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। इसलिए नहीं कि ये इनकी जरूरत है, बल्कि इसलिए क्योंकि इनके बुजुर्गों को महात्मा गांधी जो रास्ता दिखाया था। वह आज इनके लिए किसी धरोहर से कम नहीं है। आजादी के बाद से आज तक इस गांव के लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। चरखे की कमाई ज्यादा न होने की वजह से बच्चे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं।

कहने को तो गांव में चरखा चलाने के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र भी बनाया था, जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। यहां के लोग आज भी मशीन या प्रशासनिक सुविधाओं के इंतजार में बैठे हैं। अब ये विरासत कमजोर होने लगी है, क्योंकि चरखे से बनाए कपड़ों से उनका घर नहीं चल पाता। ग्रामीणों का कहना है कि वह बापू की विरासत को तो संभाले हुए हैं। लेकिन उनका गांव और उनकी यह कला आज भी पहचान की मोहताज है, क्योंकि उन्हें आज तक कोई मदद मिली ही नहीं।

कलेक्टर रानी बाटड़ ने बताया कि रामनगर तहसील के सुलखमा में जो चरखा या हतकरघा से कपड़ा बनाया जा रहा है, उसके लिए हम प्रयास करेंगे कि हमारी जो विभागीय योजनाएं जैसे ग्रामीण विकास की योजना या हतकरघा विभाग की योजनाएं है, हम उससे उन्हें लाभान्वित करेंगे। हम यह भी प्रयास करेंगे कि उनके द्वारा बनाये जा रहे कपड़े या वस्त्र हम उन्हें बाजार में उपलब्ध कराएंगे। अभी दो अक्तूबर को गांधी जयंती है। हम इस अवसर पर कोशिश करेंगे कि वहां हम कुछ आयोजन करें और उनकी जो भी आवश्यकता है, उसको हम समझने एवं सर्वे करने की कोशिश करेंगे।

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