चरखे में काता जाने वाला सूत
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पाल समाज के लोगों ने बताया कि एक कंबल को बनाने में एक सप्ताह का समय लगता है और इस एक कंबल की कीमत करीब 800 से 900 रुपये मिलती है। लिहाजा, इतने से पैसे से जीवन का गुजारा कैसे होगा। बावजूद इसके ग्रामीण अपनी समस्याओं को दरकिनार करते हुए गर्व के साथ इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। इसलिए नहीं कि ये इनकी जरूरत है, बल्कि इसलिए क्योंकि इनके बुजुर्गों को महात्मा गांधी जो रास्ता दिखाया था। वह आज इनके लिए किसी धरोहर से कम नहीं है। आजादी के बाद से आज तक इस गांव के लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। चरखे की कमाई ज्यादा न होने की वजह से बच्चे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं।
कहने को तो गांव में चरखा चलाने के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र भी बनाया था, जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। यहां के लोग आज भी मशीन या प्रशासनिक सुविधाओं के इंतजार में बैठे हैं। अब ये विरासत कमजोर होने लगी है, क्योंकि चरखे से बनाए कपड़ों से उनका घर नहीं चल पाता। ग्रामीणों का कहना है कि वह बापू की विरासत को तो संभाले हुए हैं। लेकिन उनका गांव और उनकी यह कला आज भी पहचान की मोहताज है, क्योंकि उन्हें आज तक कोई मदद मिली ही नहीं।
कलेक्टर रानी बाटड़ ने बताया कि रामनगर तहसील के सुलखमा में जो चरखा या हतकरघा से कपड़ा बनाया जा रहा है, उसके लिए हम प्रयास करेंगे कि हमारी जो विभागीय योजनाएं जैसे ग्रामीण विकास की योजना या हतकरघा विभाग की योजनाएं है, हम उससे उन्हें लाभान्वित करेंगे। हम यह भी प्रयास करेंगे कि उनके द्वारा बनाये जा रहे कपड़े या वस्त्र हम उन्हें बाजार में उपलब्ध कराएंगे। अभी दो अक्तूबर को गांधी जयंती है। हम इस अवसर पर कोशिश करेंगे कि वहां हम कुछ आयोजन करें और उनकी जो भी आवश्यकता है, उसको हम समझने एवं सर्वे करने की कोशिश करेंगे।