हयात ले के चलो कायनात ले के चलो, चलो तो सारे जमाने को साथ लेकर चलो।
डॉक्टरी उनके लिए महज एक पेशा नहीं। प्रार्थना का एक जरिया है। जब वे किसी मरीज की जिंदगी बचाने के लिए जूझ रही होती हैं, उस वक्त उनकी आस्था और यकीन भी दांव पर लगा होता है। मरीज व उसके परिवार के चेहरे पर दिखने वाली खुशी को ही वे अपनी प्रार्थना का परिणाम समझती हैं। समाज की सेहत का ख्याल रखते-रखते अक्सर वे खुद को भी पीछे छोड़ देती हैं। व्यक्तिगत योगदान से ऊपर उठकर उनकी टीम भावना भी काबिल-ए-तारीफ है। आइए, सलाम करते हैं ऐसी डॉक्टरों को... रोली खन्ना की रिपोर्ट
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100 सालों का रिकॉर्ड तोड़ा, बनीं सर्जन
डॉ. गीतिका नंदा सिंह, सर्जरी डिपॉर्टमेँट, केजीएमयू।
डॉक्टर बनना तक तो सही था, लेकिन जब उन्होंने तय किया कि सर्जरी में जाऊंगी तो सब अवाक थे। मां तो इतनी डरी थीं कि कई दिनों तक रोती ही रहीं। लड़के वालों ने कहा कि सर्जन से शादी नहीं करनी, क्योंकि इसके पास घर के लिए समय ही नहीं रहेगा। यह कहानी है केजीएमयू की सर्जन डॉ. गीतिका नंदा की। डॉ. नंदा के मुताबिक, दरअसल लोगों की सोच गलत नहीं, सर्जरी फील्ड ही ऐसी है, जो डिमांडिंग मानी जाती है। यहां आपको 24 घंटे तैयार रहना पड़ता है। मौलाना आजाद लोकनायक हॉस्पिटल जब मैंने जॉइन किया तो वहां मुझे पहले स्वीकार ही नहीं किया। एक लड़की से गलती कभी स्वीकार नहीं की जाती है, पर थोड़ा वक्त लगता है। धीरे-धीरे आपकी इमेज बन जाती है, क्योंकि आपका काम बोलता है। बताती हैं कि केजीएमयू में आई, यहां 100 साल से सर्जरी में कोई महिला सर्जन नहीं थी। डॉक्टर गीतिका को एंडोस्कोपिक थायरॉइड सर्जरी और ब्रेस्ट आंकोप्लास्टी कंजर्वेेशन शुरू करने के लिए जाना जाता है। हमारी सोच: परिपक्वता इसमें हैं कि आप महिला-पुरुष का भेद छोड़े और खुद को सिर्फ डॉक्टर समझें।
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इलाज के साथ तैयार कर रहीं नए डॉक्टर
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी की महिला विंग है क्वीन मेरी अस्पताल। पिछले 17-18 वर्षों में इसकी सूरत काफी बदल चुकी है। आईवीएफ व इनफर्टिलिटी यूनिट भी यहां है। लेप्रोस्कोपी व एंडोस्कोपी की सुविधा भी यहां मौजूद है। पहले यहां हर साल 3000 मरीज ही देखी जाती थीं, लेकिन अब यह आंकड़ा 10-11 हजार से ज्यादा मरीज तक पहुंच चुका है। पूरे प्रदेश के साथ-साथ नेपाल तक की मरीज यहां आती हैं। यह सब संभव है एचओडी डॉ. विनीता दास, डॉ. एसपी जैसवार व टीम की बदौलत। डॉ. विनीता दास कहती हैं कि इन्फ्रास्ट्रक्चर के हिसाब से हमने काफी कुछ हासिल किया है। पहले दो कमरे की ओपीडी थी, अब 14 कमरे हैं। हाल ही 100 बेड की एमसीएच शुरू हुई है। हमारी कोशिशों का नतीजा है कि स्टेट हेल्थ सिस्टम का खाका तैयार हुआ। हम टीचिंग की टेक्नोलॉजी को लगातार अपडेट करते हुए देश के लिए बेहतर महिला एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ तैयार कर रहे हैं। डॉ. जैसवार कहती हैं कि मरीजों को समर्पित यहां की हर वरिष्ठ डॉक्टर की अपनी एक अलग विशेषता है, जिसके लिए यूपी ही नहीं बल्कि देश-विदेश में भी उनका नाम है। इसके अलावा हमने साफ-सफाई व मरीजों को दी जाने वाली सुविधाओं को कई गुना बेहतर कर दिखाया है।
क्वीन मेरीः डॉ. सीमा मेहरोत्रा, डॉ. रेखा सचान, डॉ. उर्मिला सिंह, डॉ. विनीता दास, डॉ. एसपी जैसवार, डॉ. स्मृति अग्रवाल व डॉ. अंजु अग्रवाल।
हम यही कहेंगे: अपनी ड्यूटी ईमानदारी से पूरी करें।
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रोशन कर रहीं उम्मीद के चिराग
जीपीजीआई का मैटरनिटी रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट कई मायने में अनूठा। यहां से इलाज कराकर लौटे मरीजों से पूछिए तो कहते हैं कि यह जगह उनके लिए मंदिर से कम नहीं। निराश हो चुके कई लोगों के आंगन की किलकारियां यहां के डॉक्टरों की टीम की बदौलत है। विभाग की प्रमुख डॉ. मंदाकिनी प्रधान कहती हैं कि हम कुछ कर पाते हैं, क्योंकि हमारे साथ समर्पित और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम है। डॉ. नीता, डॉ. संगीता, डॉ. श्रुति जैन, डॉ. श्रुति, डॉ. सिद्धिदात्री, डॉ. इंदु, डॉ. अश्मिना, डॉ. गार्गी, डॉ. विभा, डॉ. लिपि व डॉ. भूमिका पूरी तरह से मरीजों के प्रति समर्पित हैं। यहां की विशेषज्ञ डॉक्टरों को तमाम जटिलताओं के बीच भी गर्भ में पल रहे भ्रूूण की जिन्दगी बचाने के लिए जाना जाता है। डॉ. मंदाकिनी को अपनी टीम पर गर्व है। कहती हैं कि हमारी टीम एक दूसरे को पढ़ लेती है। भ्रूण में ब्लड ट्रांसफ्यूजन के दौरान मुझे बोलने की जरूरत नहीं पड़ती, उस वक्त एक-एक सेकंड महत्वपूर्ण होता है, ये लोग पल-पल के हिसाब से काम करती हैं। उनके डिसीजन पर मुझे भी शक नहीं होता। हाल ही में फॉग्सी की जेनेटिक एंड फीटल कमेटी की चेयरपर्सन बनीं डॉ. प्रधान बताती हैं कि हमारा तालमेल सिर्फ विभाग में ही नहीं, बल्कि अन्य विभागों के साथ भी बेहतर है। सीवीटीएस, इंडोक्राइन सर्जरी या अन्य। हम कोऑर्डिनेट कर बेहतर तरीके से काम करते हैं। विभाग की उपलब्धि के बारे में वे कहती हैं कि यहां से ट्रेंड डॉक्टर कई जगह अपना बेहतर दे रहे हैं और उन्हें विशेषज्ञ रूप में सभी ने स्वीकार किया है। हमने ही यहां पहली बार भ्रूण में ब्लड ट्रांसफ्यूजन शुरू किया। विश्व के सबसे छोटे भ्रूण में ट्रांसफ्यूजन का रिकॉर्ड भी इसी टीम के नाम है। एसजीपीजीआई : मैटरनल रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट डॉ. मंदाकिनी प्रधान, डॉ. नीता, डॉ. संगीता, डॉ. श्रुति जैन, डॉ. श्रुति, डॉ. सिद्धिदात्री, डॉ. अश्मिना, डॉ. गार्गी, डॉ. विभा, डॉ. लिपि, डॉ. इंदु व डॉ. भूमिका।
ऐसा सोचते हैं हम: समर्पण काम के प्रति जरूरी है,खासकर जिस पेशे में हैं उसमें।
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क्वालिटी ट्रीटमेंट में अव्वल।
क्वालिटी ट्रीटमेंट हो या स्वच्छता अभियान के तहत कायाकल्प योजना, वे हर जगह आगे हैं। हर मानक पर खुद को खरा साबित किया। झलकारी बाई महिला अस्पताल क ी सीएमएस डॉ. सुधा वर्मा और डॉ. उर्मिला व डॉ. शिवानी की टीम ने साबित कर दिया कि यदि तय कर लें तो असंभव कुछ भी नहीं। डॉ. सुधा बताती हैं कि हमें एंट्री लेवल एक्रिडेशन मिल चुका है।हॉस्पिटल का नया इमरजेंसी कॉम्प्लेक्स तैयार करा रहे हैं। इमरजेंसी डिलीवरी की सुविधा भी हमारे यहां है। 82 बेड का यह अस्पताल शहर का ऐसा सरकारी अस्पताल है, जहां क्वालिटी पेशेंट ट्रीटमेंट का पूरा ध्यान रखा जाता है। इसीलिए हमें एनएबीएच सर्टिफिकेट मिला है और कायाकल्प में हम उत्तर प्रदेश में छठे स्थान पर हैं। लखनऊ के अस्पतालों में हमारा दूसरा स्थान है।
झलकारी बाई अस्पताल: डॉ. सुधा वर्मा, डॉ. उर्मिला आर्य व डॉ. शिवानी सिंह अपनी तो सोच यही है: महिलाएं हर क्षेत्र में आगे हैं और कहीं ज्यादा क्वालिटी ओरिएंटेड हैं।
हमारी ताकत: परस्पर समझ के साथ काम करना हमारी आदत है।
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मूवमेंट डिसऑर्डर दूर करने मे महारत
डा. श्वेता पांडेय न्यूरोलॉली, केजीएमयू
जीबीपंत व आरएमएल दिल्ली के बाद केजीएमयू जॉइन किया। यहां के न्यूरोलॉजी विभाग में उन्हें मूवमेंट डिसऑर्डर दूर करने की विशेषज्ञ डॉक्टर के रूप में जाना जाता है। केजीएमयू में प्रो. देविका नाग के बाद न्यूरोलॉजी में वह पहली डॉक्टर हैं। कहती हैं कि एक महिला होने के नाते, यदि आप अकेली हैं तो चुनौतियां बढ़ जाती हैं। जहां तक सवाल न्यूरोलॉजी की इस फील्ड को चुनने का है तो यहां मरीज को आपका भरपूर समय चाहिए। मेरे सामने भी सवाल था कि मरीजों और घर केबीच तालमेल कैसे बैठाऊंगी, लेकिन सबकुछ संतुलित रूप से चल रहा है। मूवमेंट डिसऑडर्र आमतौर पर ऐसी बीमारी है, जिसमें आपका कोई अंग लगातार गति करता रहता है, जिसे असामान्य माना जाता है। हम बॉटलिनम थेरेपी को इसका बेहतर इलाज मानते हैं और अभी तक इस विधा से इलाज में ठीक होने की सफलता की दर ठीक है। 'डरने से काम नहीं चलता, काम में आत्मविश्वास जरूरी है'
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पूरे एशिया में साबित की अपनी क्षमता
आम तौर पर सरकारी अस्पतालों की बदइंतजामी के चलते लोग वहां जाने से कतराते हैं, पर वीरांगना अवंतिबाई (डफरिन) महिला अस्पताल परिसर में कदम रखते ही आपका यह भ्रम टूट जाएगा। चारों तरफ हरियाली और साफ-सफाई आधी बीमारी पहले ही दूर कर देती है। सुपरिंटेंडेंट इंचार्ज डॉ. नीरा जैन बताती हैं कि हमारी ताकत हमारी टीम है। डॉ. रश्मि, डॉ. मधुलिका, डॉ. शाहीन खान, डॉ. रेनुका कश्यप, डॉ. लिली सिंह समेत अन्य डॉक्टरों की टीम चौबीस घंटे जच्चा-बच्चा के बेहतर स्वास्थ्य के लिए काम करती है। हमें नेशनल क्वालिटी अश्योरेंस सर्टिफिकेट व एनएबीएच का प्रमाण पत्र मिल चुका है। यह साबित करता है कि हम अस्पताल में क्वालिटी ट्रीटमेंट दे रहे हैं और हमारी पैथोलॉजी सभी अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा कर रही है। पिछले कई सालों से हम लगातार कायाकल्प पुरस्कार हासिल करते आ रहे हैं। खास बात यह कि हमारे यहां सिर्फ प्रसव सुविधा ही नहीं दी जाती, बल्कि महिलाओं से संबधित हर रोग का इलाज होता है। साथ ही सभी सरकारी योजनाओं का लाभ महिलाओं को दिया जाता है। यही वजह है कि हम एशिया के सर्वश्रेष्ठ महिला अस्पतालों में से एक हैं। यूपी का मॉडल कंगारू मदर केयर व सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट ट्रेनिंग सेंटर डफरिन में ही है।
डॉ. नीरा जैन, डॉ. रश्मि, डॉ. मधुलिका, डॉ. शाहीन खान, डॉ. रेनुका कश्यप व डॉ. लिली सिंह।
हमने ये ठाना है: कोई भी मरीज बिना इलाज के न लौटे और हम अपना शत प्रतिशत दें।
हमारी ताकत: पर्सनल या प्रोफेशनल लाइफ दोनों में ही एक-दूसरे का सम्मान जरूरी है।
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घर घर जाकर सुझाए उपाय कम किया निमोनिया का डर
डॉ. शैली अवस्थी।
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के बाल रोग विभाग क एक जाना-माना नाम हैं डॉ. शैली अवस्थी। केजीएमयू में रिसर्च विंग की संस्थापक डॉ. शैली के पास ही मेडिकल एजुकेशन का जिम्मा भी है। उन्हें निमोनिया के खतरे कम करने के लिए जाना जाता है। वह बताती हैं, उन दिनों निमोनिया का खौफ बहुत ज्यादा था। निमोनिया से मरने वाले बच्चों की संख्या भी बहुत ज्यादा थी। दरअसल लोग इसके लक्षण पहचान नहीं पाते थे, इसलिए समय पर इलाज नहीं मिल पाता था। ऐसे में जागरूकता जरूरी थी। हम उत्तर प्रदेश के हर जिले में घर-घर गए, लोगों को समझाया। नतीजा सामने था। पांच दिन का इलाज तीन दिन का रह गया। डॉ. शैली के मुताबिक, हमने यह पता लगाने की कोशिश की वे सूक्ष्म कारण कौन-से हैं, जिनसे निमोनिया का संक्रमण होता है। यह शोध कई जाने-माने जर्नल में प्रकाशित हो चुका है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की नोडल अफसर डॉ. शैली फिलहाल अपनी टीम की सदस्य डॉ. ज्योति चोपड़ा, डॉ. उमा सिंह, डॉ. विमला वेंकटेश, डॉ. अर्चना घिन्डियाल, डॉ. अनुराधा व डॉ. निश्छल के साथ नए कॅरिकुलम को लागू कराने में जुटी हैं। हमारी ताकत: सीमाएं तय नहीं की है। साथ मिलकर दूर तक आगे बढ़ रहे।
हर किसी की मुस्कुराहट का रखती हैं खयाल।
केजीएमयू के प्रॉस्थोडॉन्टिक्स डिपार्टमेंट की युवा टीम में कुछ भी कर गुजरने का जज्बा है। एमडीएस टॉपर डॉ. स्नेहकिरन और बेस्ट पेपर व सोशल वर्क के लिए कई बार सम्मानित की जा चुकीं डॉ. प्रांजलि व उनकी टीम प्रयोग में यकीन रखती है। उनके लिए दांत का इलाज ही नहीं मरीज की मुस्कुराहट अहम है। फिलहाल आदिवासी महिलाओं के उत्थान के लिए काम कर रहीं डॉ. प्रांजलि बताती हैं कि लोगों को मालूम ही नहीं कि उनकी बीमारी क्या है और क्यों हैं। आदिवासियों में थोड़ी बहुत भी जागरूकता नहीं है। वहीं मेनोपाज के बाद महिलाएं कई तरह की दिक्कतें सिर्फ इसलिए झेलती हैं कि उन्हें जानकारी ही नहीं होती। हम इसी जागरूकता के प्रचार-प्रसार में जुटे हैं। बस्तियों में बच्चों को शिक्षित करने का जिम्मा भी इस टीम ने ले रखा है। हालांकि ये काम न तो उनके पेशे की जरूरत है न ही बाध्यता। डॉ. स्नेहकिरन कहती हैं कि एक डॉक्टर होना ही कई जिम्मेदारियां दे जाता है, इसलिए हमें दायरे बढ़ाने होंगे। हमारी टीम बस इसी सोच के साथ आगे बढ़ रही है।
हमारी ताकत: साथ रहकर हम थकते नहीं, एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते हैं।
हमारा इरादा: ‘चिकित्सा क्षेत्र में हम कुछ नए मानदंड स्थापित करें।
केजीएमयू, प्रॉस्थोडॉन्टिक्स: डॉ. स्नेहकिरन, डॉ. अंकिता, डॉ. सौम्या, डॉ.प्रांजलि, डॉ. हर्षिका, डॉ. साक्षी, डॉ. नीतू सिंह।