स्टार एक्ट्रेस विद्या बालन ने मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले का स्वागत किया और इस फैसले को काबिलेतारीफ बताया।
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फिल्मों में काले धन के इस्तेमाल पर उन्होंने कहा, वह जमाना और था, जब फिल्मों में काला धन लगाया जाता था। अब तो कॉरपोरेट कल्चर है। सब कुछ सामने है। कलाकारों को पेमेंट भी चेक से ही होता है।
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विद्या 2 दिसंबर को अपनी आने वाली फिल्म 'कहानी 2' के प्रचार के सिलसिले में लखनऊ में थीं। सरकार के फैसले का समर्थन करने के साथ ही वह यह भी कहना नहीं भूलीं कि इसका असर फिल्मों पर पड़ रहा है। लोग फिल्म देखने के लिए नहीं निकल रहे हैं।
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जब यह फैसला आया, उसकी अगली सुबह मैं सी-लिंक पर थी। वहां टोल पर अधिकतर लोग चेंज कराते हैं, लेकिन उस दिन मुझ घंटे भर इंतजार करना पड़ा।
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विद्या ने कहा कि एक दौर था जब रेखा, स्मिता पाटिल, जीनत आमान के लिए महिला प्रधान किरदार लिखे जाते थे। फिर, हीरो को ध्यान में रखकर अभिनेत्रियों के लिए सपोर्टिंग किरदार लिखे जाने लगे, लेकिन अब वही पुराना दौर फिर से लौट आया है। महिला प्रधान फिल्में लिखी जा रही हैं।
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विद्या ने बताया कि फेमेनिज्म शब्द से डर लगता है। आज के समय में नारीवाद का अर्थ ही बदल गया है। इस बारे में क्या कहूं, क्या नहीं...कुछ समझ नहीं आता। मायने बदल गए हैं। फेमेनिज्म को सुपरफीशियल बना दिया गया है।
कपड़ों से तय नहीं होती सोच
विद्या ने कहा कि मैं साड़ी इसलिए पहनती हूं कि बचपन से मैंने अपने आसपास ऐसा ही माहौल पाया है, जिसमें मैं खुद को कंफर्टेबल पाती हूं, लेकिन मेरे खयालात अलग हैं। ऐसे ही अगर कोई छोटे कपड़े पहनता है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह मॉर्डन है। दरअसल, आधुनिक सोच का कपड़ों से कोई लेना-देना ही नहीं है।